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Story Transcript

लेबनॉन की वो रात तथा अन्य कहानियाँ

(कहानी संग्रह)

लेबनॉन की वो रात तथा अन्य कहानियाँ

डॉ. शैलजा सक्सेना शृंखला संपादक

तेजेन्द्र शर्मा

प्रलेक प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड *in association with JVP Publication Pvt. Ltd.

इस पुस्तक के सर्वाधिकार सुरक्षित हैं, प्रकाशक की लिखित अनुमति के बिना पुस्तक के किसी भी अंश की, ई-बुक, फोटोकापी, रिकॉर्डिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक, मशीनी, किसी भी माध्यम से और ज्ञान के संग्रहण एवं पुन:प्रयोग की प्रणाली द्वारा किसी भी रूप में, पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नहीं किया जा सकता।

ISBN : 978-93-90500-12-3

पहला पेपरबैक संस्करण : जनवरी 2022 प्रकाशक

प्रलेक प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड PRALEK PRAKASHAN PVT. LTD.

702, जे/50, एवेन्यू-जे, ग्लोबल सिटी, ि‍वरार (वेस्ट), ठाणे, महाराष्ट्र-401303 दूरभाष : 7021263557 Whatsapp : 9833402902 Email : [email protected] Website : www.pralekprakashan.com

लेबनॉन की वो रात तथा अन्य कहानियाँ : डॉ. शैलजा सक्सेना

Lebanon ki wo raat tatha anya kahaniyan : Stories by Dr. Shailja Saksena

आवरण : जेवीपी पब्ल‍िकेशन प्राइवेट लिमिटेड

पुस्तक सज्जा : जेवीपी पब्ल‍िकेशन प्राइवेट लिमिटेड कॉपीराइट : डॉ. शैलजा सक्सेना

माँ और पापा की स्मृति को सादर समर्पित, जिनका आशीर्वाद मेरी कलम की स्याही है!

क्रम भूमिका दो शब्द

आग उसका जाना एक था जॉन स्मिथ चाह दाल और पास्टा दो बिस्तर अस्पताल में निर्णय नीला की डायरी पहचान : एक शाम की लेबनॉन की वो रात... वह तैयार है शार्त्र अदर मदर

9 15

17 28 40 50 57 66 78 89 98 105 118 126 132

भूमिका भारत के बाहर एक लंबे अर्से से हिन्दी साहित्य रचा जा रहा है। काफ़ी समय तक प्रवासी साहित्य के नाम पर गिरमिटिया साहित्य को ही परोसा जाता रहा। मॉरीशस, फ़िज़ी, सुरीनाम और त्रिनिदाद में लिखा हिन्दी साहित्य ही प्रवासी के खाते में आता था। मुझे यह समझ ही नहीं आ पाता था कि अभिमन्यु अनत का जन्म मॉरीशस में हुआ, उनका बचपन वहाँ बीता, उनकी पढ़ाई वहीं हुई, उनके बचपन के मित्र, खट्टी-मीठी-कड़वी यादें सभी तो मॉरीशस से जुड़ी हैं। उन्होंने कभी भारत से मॉरीशस प्रवास नहीं किया। प्रवास की पीड़ा का असर क्या होता है, इसका उन्हें कोई अनुभव नहीं तो फिर उसे प्रवासी साहित्य कह कर क्यों परोसा जा रहा है। कुछ यही बात रामदेव धुरंधर और राज हीरामन के लेखन के बारे में भी कही जा सकती है। सच तो यह है कि किसी भी भाषा का प्रवासी साहित्य उसे ही कहा जा सकता है जो कि पहली पीढ़ी के प्रवासियों द्वारा रचा गया हो। इस मामले में ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा, युरोप, अफ़्रीका, खाड़ी देश, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया में रचा जा रहा साहित्य इस श्रेणी में रखा जा सकता है। मगर यहां भी यदि किसी काल में कोई ऐसा हिन्दी रचनाकार पैदा हो जाए जिसका जन्म इन्ही देशों में हुआ हो तो वह भी प्रवासी लेखक न कहला कर भारतेतर लेखक ही कहलाने का हक़दार होगा। पिछले पच्चीस तीस वर्षों में पश्चिमी देशों में हिन्दी के बहुत से बेहतरीन कथाकार, उपन्यासकार औऱ कवि सामने आए हैं। उनका लेखन किसी भी मामले में भारत के तथाकथित मुख्यधारा के लेखन से कमतर नहीं है। मगर विदेशों में भी कुछ लेखक ऐसे हैं जो कि अपने आपको प्रवासी लेखक नहीं मानते और प्रवासी विशेषांकों में रचनाएं देने से साफ़ मना कर देते हैं। इनमें आबुधाबी से कृष्ण बिहारी (जो अब वापिस भारत आ चुके हैं), अमरीका से इला नरेन और ब्रिटेन के प्राण शर्मा का नाम विशेष तौर पर लिया जा सकता है। इसलिये ज़ाहिर है कि इन लेखकों के लेखन को इस श्रृंखला में शामिल करना उचित नहीं होगा। कमलेश्वर जी ने प्रवासी साहित्य पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि “रचना अपने मानदंड खुद तय करती है इसलिए उसके मानदंड बनाए नहीं जाएंगे। उन रचनाओं के मानदंड तय होंगे।प्रवासी लोगों की 3 श्रेणियां बनाई जा सकती हैं। एक भूमिका • 9

श्रेणी में वे लोग हैं, जो गिरमिटिया मजदूरों के रूप में फिजी, मॉरीशस, त्रिनिडाड, गुआना, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में भेजे गए थे। दूसरी श्रेणी में 80 के दशक में खाड़ी देशों में गए अशिक्षित-अर्द्धशिक्षित, कुशल अथवा अर्ध-कुशल मज़दूर आते हैं। तीसरी श्रेणी में 80-90 के दशक में गए सुशिक्षित मध्यवर्गीय लोग हैं जिन्होंने बेहतर भौतिक जीवन के लिए प्रवास किया।” मगर मैंने हमेशा प्रवासी साहित्य को तीन स्थितियों में बांटा है। पहली स्थिति है जब एक लेखक भारत से किसी दूसरे देश में प्रवास करता है और वहाँ बसने के बाद लेखन के लिये अपने भारत के अनुभवों की ओर देखता है। इस स्थिति में वह नॉस्टेलजिक लेखन का सृजन करता है। नॉस्टेलजिया कोई नकारात्मक गुण नहीं है। भारत में भी बड़े महानगरों में रहने वाले लेखक एवं कवि अपनी रचनाओं के लिये अपने गाँव, चौपाल, गाय-भैंस, खेतों आदि की बात करते हैं। वो भी नॉस्टेलजिक हो कर लिखते हैं। नॉस्टेलजिया इन्सान की फ़ितरत में शामिल है। जैसे हर पीढ़ी के लिये अतीत बेहतरीन होता है जबकि वर्तमान की आलोचना की जा सकती है। मजेदार स्थिति यह है कि कुछ नारेवादी लेखक अपने मिथकों की आलोचना में बहुत आनन्द उठाते हैं। प्रवासी लेखक दूसरी स्थिति में अपने अपनाए हुए देश की ओर ध्यान देना शुरू करता है और उसे एक बाहरी व्यक्ति की तरह देखना शुरू करता है। अब उसकी कहानियों में ऐसे वाक्य दिखाई देने लगते हैं —“अमरीका में तो ऐसा होता है”, “डेनमार्क का कल्चर अलग है” “ब्रिटेन की सड़कों पर गंद नहीं फेंका जाता” वगैरह वगैरह। यानि कि अभी भी प्रवासी लेखक अपने देश से पूरी तरह जुड़ नहीं पाया है और उसे समझने का प्रयास कर रहा है। मगर साथ ही साथ अपने अपनाए हुए देश से भारत की तुलना करता रहता है। फिर आती है तीसरी स्थिति। इस स्थिति में प्रवासी लेखक अपने अपनाए हुए देश से पूरी तरह जुड़ जाता है। अब वह अपने आप को नये समाज का अंग मानने लगता है। उसके पासपोर्ट का रंग बदल जाता है। अब वह अपने अपनाए हुए देश के मुद्दों पर ठीक वैसे ही लिखता है जैसे कोई अंग्रेज़, अमरीकी या युरोपीय लेखक लिखेगा। मगर उसकी भाषा हिन्दी होती है। इस लेखन को ब्रिटेन का हिन्दी साहित्य, अमरीका का हिन्दी साहित्य, कनाडा का हिन्दी साहित्य इत्यादि कहा जा सकता है। कारण यह है कि अब उसके मुद्दे बदल गये हैं। चाहे वह प्रवासी भारतीयों पर ही लिख रहा हो मगर उसका दृष्टिकोण अलग हो चुका है। उषा प्रियंवदा जब अमरीका में बसने आईं तो वे भारत में एक प्रतिष्ठित लेखिका बन चुकी थीं। मैं स्वयं जब लंदन में बसने आया तो मेरे तीन कहानी संग्रह काला सागर, ढिबरी टाइट और देह की कीमत वाणी प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हो चुके थे। इसलिये हमें प्रवासी लेखन के पहले चरण का लेखन करने 10 • लेबनॉन की वो रात तथा अन्य कहानियाँ

की आवश्यक्ता नहीं रही। मगर जिन लेखकों ने लेखन की शुरूआत ही विदेश में बसने के बाद की, उनकी शुरूआत आमतौर पर नॉस्टेलजिया से ही होती है। प्रवासी भारतीय लेखकों ने कहानी, उपन्यास, कविता, ग़ज़ल, व्यंग्य, लेख, आलोचना आदि सभी विधाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। ब्रिटेन में जितने साहित्यिक आयोजन होते हैं उतने शायद ही किसी अन्य देश में होते होंगे। बहुत सी संस्थाएं निरंतर इन कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं। लंदन, नॉटिंघम, बर्मिंघम, यॉर्क जैसे ब्रिटिश शहरों में निरंतर साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। यू.के. हिन्दी समिति शिक्षण कार्यों से जुड़ी है तो गीतांजलि बहुभाषीय समाज, वातायन, काव्य रंग, काव्यधारा एवं कथा यूके साहित्यिक आयोजनों से जुड़े हैं। प्रलेक प्रकाशन के जितेन्द्र पात्रो से जब भारतेतर हिन्दी साहित्य के बारे में बातचीत शुरू हुई तो एक विचार मन में आया कि भारत के बाहर रहने वाले हिन्दी साहित्यकारों का साहित्य यदि किसी एक प्रकाशक के यहां उपलब्ध हो सके तो साहित्यकारों के लिये भी अच्छा होगा और पाठकों एवं आलोचकों के लिये भी। तो यह तय किया गया कि हम प्रवासी कथाकार श्रृँखला की शुरूआत करें जिससे हर कथाकार की प्रतिनिधि रचनाएं उपलब्ध हो सकें। जितेन्द्र ने प्रोजेक्ट में रुचि दिखाई और तमाम प्रवासी कथाकारों को ई-मेल भेजे। कुछ कथाकारों ने अपनी प्रतिनिधि रचनाएं भेजीं तो कुछ एक ने अपने नये कहानी संग्रह भी भेजे। पहली खेप में अर्चना पेन्युली (डेनमार्क), रामदेव धुरंधर (मॉरीशस), उषा राजे सक्सेना, ज़किया ज़ुबैरी एवं अरुण सभरवाल (ब्रिटेन) एवं शैलजा सक्सेना व सुमन कुमार घई (कनाडा) के संकलन तैयार हो पाए हैं। जैसे जैसे अन्य कथाकार भी इस मुहिम से जुड़ते जाएंगे कारवां आगे बढ़ता जाएगा। कनाडा की सक्रिय कहानीकार एवं कवयित्री शैलजा सक्सेना के वर्तमान कहानी संग्रह ‘लेबनॉन की वो रात’ में उनकी 12 ताज़ा कहानियां संकलित हैं। शैलजा की कहानियों में भारत और कनाडा समान रूप से मौजूद रहते हैं। इन्सानी भावनाओँ को सूक्ष्म रूप से प्रस्तुत करने में शैलजा को दक्षता हासिल है। कहानी को लेकर शैलजा ने अपने एक साक्षात्कार में बहुत बढ़िया बात कही थी कहानियाँ बहुत सी घटनाओं के घात-संघात से उत्पन्न भाव और विचार से बनती हैं यानि कि केवल घटना का विवरण भर लिख देने से कहानी नहीं बनती। शैलजा की कहानियां विमर्श पैदा करती हैं। किसी विमर्श के दबाव में लिखी गयी कहानियां नहीं हैं। छोटी सी घटना से लेकर विशाल कैनवास की कहानियां रचने में शैलजा सिद्धहस्त लगती हैं। ‘उसका जाना’ कहानी के बारे में पोलैण्ड के सुधांशु शुक्ल लिखते हैं, “उसका जाना कहानी विदेशों में रह रहे ऐसे प्रवासी भारतीयों की सच्चाई को बयाँ करती है। कनाडा के परिवेश में प्रवासी भारतीयों की यह कहानी है। यह कहानी एक परिवार की नहीं है, अपितु उस समाज का भूमिका • 11

प्रतिनिधित्व करती है, जो भारत से बदहाल जीवन कनाडा में जी रहे हैं। भाषा की सीमा, गरीबी की मार, अकेलेपन की पीड़ा, जिनके सहारे आए, उनका नदारद हो जाना, ऐसे में उपजे क्रोध तिरस्कार से नारी-बच्चों का शोषण दर्शाया गया है। डॉ. शैलजा ने एक साथ कई बिंदुओं को बहुत बेहतरीन ढंग से उजागर किया है। उन्हें मानवीय मूल्यों, रिश्तों की कहानीकार कहना अनुचित न होगा।” ‘शार्त्र’ एक और संवेदनशील कहानी है जो कि एक दक्षिण अफ़्रीकी नारी की वेदना की कहानी है। युगांडा और तंज़ानिया के बीच आपसी युद्ध, तनावग्रस्त जीवन और यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ़्रंट की भूमिका से बदलती युगांडा की स्थितियों में से निकली है यह कहानी। शार्त्र अपने देश में एक ट्रेण्ड नर्स है मगर कनाडा में हेल्थ केयर सप्पोर्ट का काम करने को भी तैयार है। शार्त्र का शाब्दिक अर्थ ख़ुशी होता है। शार्त्र लूले का कहना कि मेरी माँ का देहान्त हो गया है, वह मेरे लिए “अफ़सोस करने की नहीं गर्व करने योग्य महिला थीं। मेरी माँ में सब्र था, वह मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थी पर मैं डॉक्टर नहीं बनना चाहती थी, उसने मुझे नर्स का कोर्स करवाया, ताकि मैं बाद में रुचि होने पर मेडिकल की पढ़ाई में रुचि लेने लगूँ। मेरी माँ के जीवन-मृत्यु ने मुझे बिना शर्तों के जीवन जीना सिखाया है। वह अपने देश में डॉक्टरों की कमी के कारण मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थीं। हम उसे बीमार, असहाय समझते थे, लेकिन वह देश के लिए यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ़्रंट में काम करती थी। यह बात उसने किसी को नहीं बताई, उसकी बीमारी से ही मुझे पता लगा। शार्त्र लूले का मानना है कि हम बड़े विश्वास से कहते हैं कि हम इसे जानते हैं, लेकिन क्या हम किसी को जान पाते हैं। भीतरी दुनिया में मनुष्य क्या-क्या रचता है, यह कोई नहीं जानता। मुझे बड़े और छोटे ओहदे से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। वह जानती है कि इतना बताने पर शायद उसे नौकरी पर ना भी रखा जाए। वह अंत में मुस्कुराते हुए अपने नाम की सार्थकता अर्थात् प्रसन्नता, खुशी जाहिर करती चली जाती है।” शैलजा की कहानियां इस मामले में वैश्विक कही जा सकती हैं कि वहां थीम किसी सीमा में बंधे नहीं हैं। पृष्ठभूमि और चरित्र और उनकी मानसिकता सार्वभौमिक है। शीर्षक कहानी लेबनॉन की एक रात यहूदियों पर हुई जुर्म अत्याचार की गाथा है। कई देशों में यहूदियों पर अत्याचार हुए, उन्हें क्रूरतापूर्वक मारा ही नहीं गया, उन्हें अपने लिए, इस्लामी और अन्य देशों से भागना भी पड़ा। एक ऐसे देश की तलाश में, एक ऐसी ज़मीन की तलाश में, जहाँ यहूदियों को अपना देश कहने का गौरव मिल सके। यह कहानी 1945 के लेबनॉन की है। हमें जर्मनी में यहूदियों पर हुए अत्याचारों की जानकारी तो है। मगर शैलजा अलुश्का नाम की उस लड़की की है जो दरअसल है तो मुसलमान मगर यहूदी परिवार में शरण मांगने आती है। कहानी के अंत में बेन-अब्राहम उसे अपने बेटे की मंगेतर बता कर यहूदी के रूप 12 • लेबनॉन की वो रात तथा अन्य कहानियाँ

में परिचय देते हैं। इस कहानी में शैलजा ने नारी के बारे में कुछ बेहतरीन जुमले लिखे हैं—“आदमी तो फिर दाढ़ी से पहचाने जाते हैं पर औरतों के पास तो ऐसा कोई निशान होता नहीं है। वैसे भी औरतों की एक जात होती है, औरत! आदमी का नाम, जाति, काम और धर्म होते हैं, औरत का एक ही धर्म है, औरत होना और सारी सांस्कृतिक अपेक्षाओं को पूरी करना! आदमी लड़ता है और जीती जाती है औरत! आदमी योजनायें बनाता है और उन योजनाओं के पहियों का तेल बनती है औरत, आदमी मरता है और उजड़ती है औरत! औरत जब प्रश्न करती है तो झिड़कियाँ खाती है, सलाह देती है तो बेवकूफ़ कहलाती है।” शैलजा सक्सेना अब केवल कनाडा की लेखक नहीं हैं और न ही केवल प्रवासी हिन्दी लेखक; दरअसल वे अब हिन्दी साहित्य की एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनका प्रवासी साहित्य श्रृंखला में स्वागत है। पुस्तक के प्रकाशक भाई जितेन्द्र पात्रो को भी बधाई। —तेजेन्द्र शर्मा

भूमिका • 13

दो शब्द पाठकों को अपना पहला कहानी संग्रह समर्पित करते हुए मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है। मेरे अपने लेखन/ प्रकाशन यात्रा में कविता से पहले मेरी कहानी ही 1983 में सारिका के ‘आते हुए लोग’ स्तम्भ में छपी थी पर संग्रह के रूप में ये कहानियाँ, कविता-संग्रह (क्या तुम को भी ऐसा लगा?) के बाद ही प्रकाशित हो पा रही हैं। “कहानियाँ लेकर और / मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते जहाँ ज़रा खड़े होकर / बातें कुछ करता हूँ... ...उपन्यास मिल जाते।” मुक्तिबोध की ये पंक्तियाँ मन में घुमड़ती रही हैं। मुझे भी अनेक देशों के अनेक लोगों की, छोटे दृश्य से लेकर विशाल फलक पर फैले जीवन की अनेक कहानियाँ दिखाई देती हैं। कुछ काग़ज़ पर उतर पाईं, कुछ उतरने की प्रतीक्षा में हैं। आपको इस संकलन की कहानियों में भारत और कैनेडा के साथ ही कुछ अन्य देशों की पृष्ठभूमि दिखेगी। पिछले 27 सालों में मुझे भारत के साथ-साथ कैनेडा, अमेरिका और इंग्लैंड में भी रहने का अवसर मिला, दुनिया के विभिन्न देशों से आए लोगों के जीवन संघर्ष भी पास से देखे। स्थान भेद की भिन्नता होने पर भी कभी जीवन की मूल चिन्ताएँ समान दिखाईं दीं तो कभी संस्कृति भेद होने से कुछ नया भी देखने, समझने को मिला और इस तरह इन कहानियों ने जन्म लिया। अपने लेखन के साथ-साथ, भाषा और साहित्य के लिए अनुकूल वातावरण बनाने का दायित्व भी प्रवासी लेखकों पर होता है, जिसके लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ती है। यह वातावरण अगर हम नहीं बनाएँगे तो अगली पीढ़ी को भारतीयता से जोड़ कर रख पाना असंभव हो जाएगा, यही सोच कर अनेक साहित्यिक कार्यक्रमों, गोष्ठियों और हिन्दी नाटकों आदि के आयोजन में बहुत अधिक ऊर्जा लगाती रही, इस बीच प्रकाशन का काम पिछड़ गया। कुछ कहानियाँ साझा-संकलनों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं पर परिवार और मित्रों के अनेक आग्रहों के बाद भी मैं लग कर संकलन के प्रकाशन पर कार्य नहीं कर पाई। तेजेन्द्र जी ने प्रलेक प्रकाशन द्वारा संकलन प्रकाशन सूची में चयन कर के, पुस्तक प्रकाशन के लिए पांडुलिपि भेजने के लिए जब कहा तब भी उतनी आश्वस्त दो शब् • 15

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