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Story Transcript

maE AaEr maera Akelaapana

paXvaIna gauptaa

मैं और मेरा अकेलापन

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प्रवीन गुप्ता

NOTION PRESS India. Singapore. Malaysia. ISBN 979-888641275-8 © Pravin Gupta This book has been published with all reasonable efforts taken to make the material error-free after the consent of the author. No part of this book shall be used, reproduced in any manner whatsoever without written permission from the author, except in the case of brief quotations embodied in critical articles and reviews. The Author of this book is solely responsible and liable for its content including but not limited to the views, representations, descriptions, statements, information, opinions and references [“Content”]. The Content of this book shall not constitute or be construed or deemed to reflect the opinion or expression of the Publisher or Editor. Neither the Publisher nor Editor endorse or approve the Content of this book or guarantee the reliability, accuracy or completeness of the Content published herein and do not make any representations or warranties of any kind, express or implied, including but not limited to the implied warranties of merchantability, fitness for a particular purpose. The Publisher and Editor shall not be liable whatsoever for any errors, omissions, whether such errors or omissions result from negligence, accident, or any other cause or claims for loss or damages of any kind, including without limitation, indirect or consequential loss or damage arising out of use, inability to use, or about the reliability, accuracy or sufficiency of the information contained in this book.

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मैं और मेरा अकेलापन

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प्रवीन गुप्ता

आप के मोहब्बत के नाम

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मैं और मेरा अकेलापन

Contents •

संदेश..................................................................Page 07



लेखक पररचय...................................................Page 08



चुननंदा अशआर..........................................Page 10-16



कनवताये.ेँ .....................................................Page 18-31



ग़ज़लें.........................................................Page 33-109

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प्रवीन गुप्ता

संदेश नप्रय पाठक, शुनिया जो आपने इस लेखक पर भरोसा करके इस पु स्तक को पढने का कष्ट उठाया है । यह पुस्तक ग़ज़लों, शायररयों तथा कनवताओं का संग्रह है , जो मैंने तब तब नलखी है जब जब मैं अकेला हुआ हं , मन उदास रहा है । न तो मैं कोई कनव हं और न लेखक। मैं तो नसर्फ अकेलेपन का नशकार या येँ कहेँ तो मरीज़ हं । नदल में कई बातें होती हैं बोलने को पर अफ्सोसं , कोई मुझे सुनने वाला नही होता, नसवाय इन कोरे कागजों के। मैं अक्सर इन्ही से अपना दु ुः ख, ददफ और अकेलापन साझा करता हं । नर्र एक समय आता है जब मेरे शब्द पत्थर की लकीर में तब्दील हो जाते हैं और बन जाते हैं ग़ज़ल या हर पीनित की वानि। इस पुस्तक में नलखी हर एक पंक्तियाेँ मेरे नज़न्दगी से तो नही जुिी हैं , पर शायद अपके जीवन से जरूर जुिी हों। आशा करता हं की आप इस पुस्तक को उसी मन से पढें गे नजस मन से मैंने नलखा है और अपने दोस्तों तथा ररस्तेदारों को भी इसे पढने के नलए प्रेररत करें गे । आपका अपना, प्रवीन गुप्ता

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मैं और मेरा अकेलापन

लेखक परिचय मौजदा रूप से नदल्ली में रहने वाले प्रवीन गुप्ता का जन्म 11 माचफ, 2004 को कनवयों के नगरी, गोरखपुर में हुआ था | प्रवीन ने मात्र 14 साल के उम्र से ही नकताबें नलखना शुरू कर नदया और अब तक उन्होंने 'मैं और मेरा अकेलापन' को नमलाकर पांच नकताबें प्रकानशत कर दी हैं , नजनमे से सभी अंग्रेजी भांषा में नलखी हुईं है | वे नलखने के साथ साथ गाने बनाने , कंप्यटर कोन ं ग और वाइल्डलाइर् र्ोटोग्रार्ी में भी नदलचस्पी रखतें हैं | प्रवीन ने 2021 के अप्रैल महीने से एक सोशल मीन या एप्प बनाना शुरू नकया नजसे वो उसी साल जन में सर्लतापवफक गगल के प्ले स्टोर पर लां च कर नदया, अंततुः बन गये का फ (Cord) के संस्थापक | उनके बारे में दे श के कई नामी अखबार भी छाप चुके हैं | उनका सपना है की वह भारत को एक समृनि और आिुननक दे श बनायें | आप उनसे ननचे नदए गये जगहों से संपकफ कर सकते हैं | Cord - @enigmaticpravin Instagram - @enigmaticpravin Facebook - @enigmaticpravin/@pravingupta2020 Twitter - @enigmaticpravin E-mail - [email protected]

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प्रवीन गुप्ता

चुननंदा अशआर।

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मैं और मेरा अकेलापन 1. मोहब्बत मेरे नलए एक ख्वाब है । यह झठ, नमयां , लाज़वाब है । 2. नसपाही प्यासे मर गए। दु श्मन पी गया समंदर।

3. र लगता था उनके पास जाने से । अब न जाने कहाेँ गुम हो गए वो नकसी बहाने से।

4. मोहब्बत अगर एक ख्वाब है तो मैं तुम्हे भल जाऊंगा। पर अगर ये हकीकत है तो मैं कभी तुम्हे भल जाऊंगा तुम ये भल जाओ।

5. यह शहर नही,ं महनर्ल है । यह नदल्ली नही,ं मेरा नदल है ।

10 | P a g e

प्रवीन गुप्ता 6. मैं ओस हं , तुम घां स। मेरी मंनजल तुम्ही हो। 7. मुझे मत मशवरा दे नजंदगी कैसे जीते हैं । पररं दो को उिना मछनलयां नही नसखाती।ं

8. अकेले रहने में मजा नही आ रहा। ऐ गम, त भी आजा। साथ रं हें गे।

9. वर्ादारी की नशकायत मौत से जरूर लगाऊंगा मैं। कमबख्त ने जीते -जी मार नदया है मुझे।

10. बहुत कहर ढाती है उनकी आं खे। पलके उठी ं तो कयामत है , पलके झुंकी तो कयामत है ।

11 | P a g e

मैं और मेरा अकेलापन 11. मेरे गम के बादल, जरा संभाल खुदको। अगर बरस गया न, तो बाढ़ आ जाएगी।

12. जब उनसे बातें कम होने लगी, मेरी आेँ खें नम होने लगी।ं 13. आज खुश वही है जो कल परे शान था । अंतहीन होता है क्षमता हर एक इं सान का । इनतहास गवाह है पवफत से ऊंची नजसकी सोंच रही है , नापा उसी ने है कद आसमान का ।

14. आजकल कहते हैं वो लोग, "बिी तकलीफ़ दे ती है तुम्हारी खामोशी।" नजनको कभी मेरी आवाज़ चुभा करती थी।

15. ढ़ंु ढ़ते रह गए वह दररया मे पानी। आया जो मेरे आेँ खो मे सैलाब था। प्यास भी लगी उनके नदल को उसी नदन, सुखा पिा नजस नदन मेरे इश्क का तलाब था।

12 | P a g e

प्रवीन गुप्ता 16. हाेँ , बेवकर् मैं ही था जो प्यार को नर्रत से तौल रहा था। बा इतना नशे में था नक खुदके राज परत-दर-परत खोल रहा था। एक पल तो लगा नक शायद मैं ही गुंगा हो चुका हेँ । वो तो बाद में पता चला नक मैं तो बहरों की नगरी में बोल रहा था।

17. परे शाननयों की चालाकी भी तो दे क्तखए, जनाब। यह नपछा भी उन्ही का करती हैं जो इनसे बचना चाहते हैं ।

18. खुश रहता हेँ अपने तनहाई से लोगों के र्रे ब से नगला जो है ।

19. अक्तखर लगे तो लगे

र मौत से क्ों जब ददफ जीने में है ।

तुझे कौन मार सकता है , तेरी जान तो मेरे सीने में है । हजार यक्तियाेँ बताई लोगो ने अमर रहने की। पर वह मजा कही ं और कहाेँ जो मजा जहर नपने में है ।

13 | P a g e

मैं और मेरा अकेलापन 20. सीख ही रहा था मैं मौत को गले लगाना नक वह कमबख्त मुझे जीना नसखा गया। 21. मुझे बोलना तो नही ं पर नलखना आता है । अपनी गलनतयों से सबक सीखना आता है । जवाब तो खामोनशयों से भी नदया जा सकता है पर लोगो को तो नसर्फ चीखना आता है ।

22. हम रते रहे उनके बेवर्ाई से और वह हमसे ही वर्ा कर बैठे।

23. छोि गए वह मुझे एक अंिेरे जंगल में, और मैं, कमबख्त, उस अंिकार को ही अपना घर समझ बैठा।

24. इतना गुरूर मत कर अपने व्यस्त नजंदगी पर, ऐ दोस्त। मेरे कामयाबी के जश्न में न आया तो क्ा हुआ। मेरी शोक सभा में तो जरूर आएगा।

14 | P a g e

प्रवीन गुप्ता 25. वकालत तो बहुत की नदल ने तुझे अपनाने की, पर साले नदमाग ने िोखा दे नदया। 26. यह राम के नगरी में कैसा पाप हो रहा है , रावि के मरने पर लोगों का ववलाप हो रहा है । 27. इसे मैं अपनी बदनसीबी नही तो और क्ा कहेँ ? मैंने सोचा था नक उसे मैं चौदह फ़रवरी को अपने नदल की बात बताऊंगा। पर उसकी तो तेरह फ़रवरी को ही शादी हो गयी। 28. हर आवाजें गलत के क्तखलार् ज़रूर उठती अगर मसला खाली पेट का न होता। 29. जब कोई लिका पंखे से लटकता है , जान उसकी माेँ का ननकलता है ।

15 | P a g e

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