Final darpan 2022 Flipbook PDF

Final darpan 2022
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Story Transcript

ऑयल एण्ड नैचुरल गैस कार्पोरे शन लललिटेड

समर्पण कविता मेरे मवततष्क के कागज़ र्र, दिल की कलम से, तुम वलखिाते चले जाते हो ॥ रक्त की तयाही से गुज़रकर, मेरी आत्मा के अनुभि, वनरं तर बहते चले जा रहे हैं, और तुम्हारी िी गई तिांसें, तुम्हारी प्रेरणा बनकर, मेरी नस-नस में िौड़ र्ड़ती है । मैं, सहेजता चला जा रहा हूँ, आर्की विशेष कृ र्ा को, अर्ने जीिन की बहुमूल्य अमानत समझ, और इततेमाल कर रहा हूँ, अर्ने जीने के वलए, जीिन-स्रोत की तरह ॥

कविता वनवित होगी जीत हमारी । र्ग चूमेगी िुवनया सारी ॥ चाहे लाख, मुसीबत आये मन मेरे तू, क्यों घबराये मानि की वहम्मत, के आगे जल-थल-नभ ने, शीश झुकाये करते रह, अर्नी तैयारी ॥ सूरज भले, आग बरसाये हिा हहरकर, तूफाूँ लाये बािल-वबजली, गरज-तड़र्कर चाहे वजतना, हमें डराये र्र हम होंगे, सब र्र भारी ॥ आज बहा जो, ख़ून-र्सीना कल चमके गा, बनके नगीना छलकें गे जो, अश्रु नयन से सीचेंग,े धरती का सीना महके गी जीिन फु लिारी ॥ वसद्ांतों को भूल न जाना िािा अर्ना, सिा वनभाना िु:ख के सागर को र्ी लेना र्र सुख की बाररश बरसाना जैसे मेघ र्रम उर्कारी ॥

कविता अरे मन ! खोल हृिय के द्वार । बंिी बन कर घुट मत प्यारे , र्ा ले नई बहार ॥ िु;ख-चचंता तुझको क्यों व्यार्ी क्यों बनता है तू संतार्ी जीिन है, इक आर्ाधार्ी कर इसको तिीकार ॥ कट जाएगी रात अूँधेरी र्ूरी होगी आशा तेरी बस कु छ र्ल की, ही है िेरी होने को उवजयार ॥ सूयप सुबह तिागत करता है सारी थकािट आ हरता है नि यौिन मन में भरता है करता नि शृंगार ॥ हर मुवककल आसान बनेगी जीने का सामान बनेगी तेरी मधुर मुतकान बनेगी व्यथप न वहम्मत हार ॥ मुवक्त के आकाश को र्ाले जो न बुझी िो प्यास बुझाले हर र्ल का उल्लास मनाले समझ एक उर्हार ॥

कविता चल अर्नी मुतकान सजा जीिन का निगान सजा रोकर मत हलकान हो प्यारे , दफर से लय और तान सजा ॥ माना िु;ख से जूझ रहा है कोई र्थ ना सूझ रहा है तेरा भाग्य अबूझ रहा है दफर भी चल, अरमान सजा ॥ माना सर र्र बोझ बहुत है जश्न से ज़्यािा सोज़ बहुत है ख़ोज ज़रा तो मौज बहुत है सफर का बस सामान सजा ॥ माना तेरा िौर नहीं है तू सबका वसरमौर नहीं है र्र, तुझसा कोई और नहीं है ख़ुि अर्ना सम्मान सजा ॥ माना लहर-लहर हलचल है जीिन का हर र्ल बेकल है दफर भी मधुर-मधुर कल-कल है तू भी नि र्ररधान सजा ॥

चतुष्र्िी

अर्ने घािों र्र ज़रा, मरहम लगाना सीवखए ििप जब ज़्यािा बढ़े, तो मुतकराना सीवखए । छलक कर अर्नी हूँसी, ही छील िेगी सारे गम, सहज में आये नहीं, तो छल से लाना सीवखए ॥

कविता प्रततुत हूँ, मैं हूँ तैयार । अभी न मानूूँगा मैं हार ॥ धैयप तोड़ते रहे प्रसंग, दकतनी बार रं ग में भंग भले हो रही हालत तंग दफर भी मन में उठे उमंग कर संघषों को तिीकार ॥ जो संकल्र् वलया है ठान उसी ओर वनरंतर ध्यान आूँधी आये या तूफ़ान खड़ा रहूँगा सीना तान । जब तक है साूँसों की तार ॥ दकतना र्ड़ा हुआ है काम कै से लूूँ हाथों को थाम यह तो है जीिन संग्राम इसमें है आराम हराम । कोई र्ल ना हो बेकार ॥ जब है मुझे, तुम्हारा साथ दफर डरने की क्या है बात जब तक जीिन की सौगात यही कामना है, दिन-रात । नि उत्कषप करें हर बार ॥

िोहे में वलखी गई एक कविता

अरी ! ओ वनमपल आत्मा, दकतनी है बेचैन कटने से ना दिन कटे, ना कटती है रै न ॥ वर्या वमलन ख़ावतर दकया, धारण मनुज शरीर काम नहीं कोई बना, बढ़ी हृिय की र्ीर ॥ एक प्रभु तुझे ना वमला, र्ार्ी वमले हज़ार कै से-कै से हो गया, ये तेरा संसार ॥ काम सतािै चाम को, आत्मा को िे िंश मोह भुलािे सत्य को, वसफ़प दिखािे िंश ॥ लोभ ने लालच डाल के , बुवद् वलया है छीन क्रोध ने सर र्र बैठकर, जुमप दकया संगीन ॥ अहंकार ने फू ल कर, फु ला वलया है गाल ये सब फु तस हो जायेगा, जब आयेगा काल ॥ बहक न यों बेकार में, कर ले सोच-विचार साधन वसफ़प शरीर है, कर अर्ना उद्ार ॥ सारे बंधन तोड़ कर, जोड़ प्रभू से तार सद्गुरु तुझको िे रहा, वनमपल वनकछल प्यार ॥ वर्या की बन कर रह सिा, वमले तिगप आनंि चेहरा वखल जाये तेरे, छू टे िु;ख और द्वंि ॥ जोड़ वर्या से नेह को, अमर प्रेम हो जाय युग तेरा िंिन करे , इक आिशप कहाय ॥

चतुष्र्िी

कोई मेरे दिल के कर टुकड़े, मुझे रोने नहीं िेता करके बेचन ै रातों में, मुझे सोने नहीं िेता सुबह और शाम वजसका नाम ले, आहें मैं भरता हूँ िो मेरा होके भी, अर्ना मुझे होने नहीं िेता ॥

कविता अमािस की काली रात के बाि, वनखरने लगा आकाश एक छोटी-सी, शुभ्र श्वेत चाूँिनी में वखलने लगा चाूँि, कहने लगा मुझसे दक- संसार की वनयवत चक्र ने हर रोज काटा है, मेरे अंग-अंग को इतना दक मैं अंगविहीन हो गया, छोड़ गए साथ मेरा सारे सगे-संबंधी, िोतत-यार मेरी मौत का मातम मनाकर र्र चज़ंिा हूँ मैं, के िल दकसी के प्यार के कारण, जो चकोर की तरह, अब भी चाहता है मुझ,े र्ागलों की तरह, उसी के वलए आता हूँ रोज, आकाश के र्टल र्र, िेखता हूँ, उसी की िुआओं से मैं जीिन में बढ़ता जा रहा हूँ, इतना दक धीरे -धीरे, मैं र्ूर्णपमा का चाूँि बनता जा रहा हूँ ॥

चतुष्र्िी

तेरे चरणों की धूवल को, मैं माथे से लगाता हूँ तुम्हारा नाम ले लेकर, सोई दकतमत जगाता हूँ तेरी रहमत बरसती है, ‘कवर्ल’ हर िक़्त यूूँ मुझर्र, भले मैं याि करता हूँ, या तुझको भूल जाता हूँ ॥

कविता चज़ंिगी ! कै सी, ये कै सी ? आत्मा जो शुद् है िेह र्र क्यों लुब्ध है गंिगी ! कै सी, ये कै सी ? िेिता वजसको बनाया उसी को इतना सताया बंिगी ! कै सी, ये कै सी ? जब प्रेममय संसार है तब क्यों ये अत्याचार है िररं िगी ! कै सी, ये कै सी ? वनवष्क्रय दक्रया कलार् है कु छ सोचना भी र्ार् है शर्मिंिगी ! कै सी, ये कै सी ? मन में नहीं उल्लास है तन जैसे चलती लाश है बेबसी ! कै सी, ये कै सी ?

कविता

क्यों हृिय की गाूँठ खोलूूँ । संिेिना जब शून्य हो तुम, क्यों मैं दफर िु:ख-ििप बोलूूँ ॥ स्नेह से सींचा मैं जाऊूँ, एक अवभलाषा थी मेरी एक युग आूँखों में बीता, दफर भी थी इक आस तेरी काल जब, अब िे रहा, संिश े र्र संिश े मुझको क्यों न वमट जाऊूँ, फ़ना हो जाऊूँ, बनकर राख़ ढ़ेरी वनष्प्राण अर्नी आत्मा ले, व्यथप में क्यों और डोलूूँ ॥ तुमसे यह होता नहीं, जो र्ास अर्ने खुि बुलाओ, और जब आया तो यह क्या, जानकर मुझको सताओ सुख और शांवत यदि वमले, मेरे हृिय को कष्ट िेकर तो मैं चाहूँगा, मुझे तलिार से, हुल-हुल हुलाओ एक अत्याचार को, तेरे नाम से, दफर और तोलूूँ ॥ जाने क्या उद्वेग बनकर, मेरी नस-नस में बहा जाने क्या-क्या जतन कर, मैंने सहजता से सहा िु;ख का सागर उमड़कर, आया जो मेरी आूँख में जाने क्यों मैं हूँस र्ड़ा, हूँसकर ज़रा, खुि से कहा क्यों न अर्ने आूँसूओं से, आज मुूँह अच्छे से धोलूूँ ॥

कविता मैंने मरना सीख वलया है ॥ मैंने वबखरना सीख वलया है ॥ कोई मेरा गला िबा िेता है, मैं कु छ बोल नहीं र्ाता जाने क्यों कटु जीिन में, मैं मधु घोल नहीं र्ाता मेरे मन के आूँगन में, दकतने रं ग उभरते हैं र्र, र्िपत जैसा बनकर, मैं कु छ भी ड़ोल नहीं र्ाता बस, आहें भरना सीख वलया है ॥ संिह े ों के दकतने कु हांसे, मन मानस में छायें हैं सच और झूठ के ताने-बाने, दकतना कु छ भरमायें हैं अभी एक से मुवक्त वमली तो, िूजे ने उलझा है दिया िेख रहा हूँ जैसे वनयवत ने, र्ल-र्ल जाल वबछायें हैं र्र, मैंने उबरना सीख वलया है ॥ रक्त मेरा आूँसू बनकर, हृिय से नेत्र की ओर चला दकसको लांछन िूूँ जब मैं, अर्नों से ही गया छला दकसका विश्वास करूँ, जब र्ीतल, सोने जैसे चमकता है, वजसको मैंने हंस कहा, िो छद्म िेश में था बगुला र्र, मैंने सूँिरना सीख वलया है ॥

कविता सुबह से अर्नी यात्रा र्र वनकला सूरज, साूँझ तक जैसे थक जाता है और अर्नी बोवझल आूँखों से, रह-रह कर िेख जाता है दक- संसार अब भी जाग रहा है, उसकी रोशनी की चाहत में और नहीं िेना चाह रहा है, िो र्ल की फु सपत भी उसे दक समेट ले अर्नी वबखरी दकरणें सारी और दफर सुबह की करले नई तैयारी, र्र, वनढ़ाल-सा सूरज अर्नी दकरणें, समेट नहीं र्ाता है । तथा रजनी के विशाल वबततर र्र, बेख़बर हो वबखर जाता है ॥

कविता रे ल का बोवझल सफ़र और मुतकराती तुम्हारी नज़र छेड़ जाती है, यािों की बारात-सी जब मुतकराकर, बैठ जाती हो चुर्चार् मेरे सामने और एकटक नज़रों से िेखती रहती हो, दििातिप्न–सी लगती रहती हो र्र, मेरे तनाि को कम कर जाती हो, हूँसती हो, वखलवखलाती हो, और मैं खुि भी विभोर हो िेखने लगता हूँ, तुम्हारी वनमपल छवि को, जो तब्िील कर िेती है, मेरे नीरस यात्रा को, चज़ंिगी के खूबसूरत सफ़र में ॥

कविता एक सर्ना, जो सर्िपयों के मौसम में, कं बल का काम करता है । एक ख़्िाब, गमी की झुलसाती लू में, बफप के टुकड़े का काम करता है । एक कल्र्ना, घनघोर िषाप में, मुझर्र फू लों की बरसात करती है । आूँधी और तूफ़ान में, मान और अर्मान में जीता रहता है तिप्न, मेरी आूँखों में, रोमांवचत होता रहता है मन, खो जाता हूँ मैं, तिप्नित िेखता रह जाता हूँ अर्ने अधूरे सर्ने को, जो जागता रहता है, हर इक र्ल, कहीं मैं सो न जाऊूँ कहीं उसे खो न जाऊूँ क्योंदक- र्ाया है मैंने बहुत प्रतीक्षा के बाि, शायि, कई युगों के र्िात, और करना है, वजसे वसफ़प मुझे ही र्ूरा, जब तक तिांस है, जब तक आस है, इसीवलए चाहता हूँ बहुत ज़्यािा की कहीं सर्ना, सर्ना ही न रह जाये, कल्र्ना, कल्र्ना ही न रह जाये प्रेरणा, प्रेरणा ही न रह जाये बवल्क, मेरे जीिन का जीिंत, जाग्रत और ज्िलंत सच हो जाये ॥

कविता

मेरे प्राणों में घुलकर रह गई है, मेरे व्यथा, जैसे अर्मावनत होकर आूँखों से टर्के , कतरे र्ानी के न होकर, ख़ून के हो गयें हैं, ररस रहे हैं धीरे -धीरे, काटकर कलेजे की कवलयों को, लहलुहान होकर शरीर, र्ड़ता जा रहा है वनढ़ाल, जैसे एक-एक शब्ि वर्घले शीशे की तरह, घुलता जा रहा है, कानों में दक बिापकत भी नहीं होता है ििप अके लेर्न का, जो बाूँट नहीं सकता, दकसी से भी मैं िीर अजुपन की तरह क्योंदक रणक्षेत्र में, कौरि ही हैं सामने जो चले आ रहे हैं, लड़ने को तैयार होकर एक अके ला अजुपन खड़ा है कौरिों के बीच कृ ष्ण का साथ लेकर वजसे तियं कह दिया है दक- िह कोई शस्त्र नहीं उठायेगा बस िेखता ही रह जाएगा युद्, एक िशपक की भाूँवत लेदकन कु रुक्षेत्र के मैिान में, लड़ना तो अजुन प को ही है अके ले, हमेशा-हमेशा के वलए ॥

कविता नींि की चािर ओढ़े वखल रहें हैं तिप्न, आूँखों की कोरों में, जैसे नहाई हुई सुबह, ओस की बूूँिों से, वबखेर िेती है, नई ताज़गी प्रकृ वत के कण-कण में, छलक उठती है मधुर मुतकान आसर्ास ही, सजीला िातािरण, बना िेता है, जीिन को प्रफु वल्लत और जीवित ॥

कविता शब्िों के जंजालों से मुक्त हुई,भािना, अक्सर मुझे प्रेररत करती है, एक नया कोई गीत रचने के वलए र्र, समय की वनमपम व्यततता, इंवगत करती है मेरे असहाय मानस को, दक- यही द्वंि ही तो जीिन है, जहाूँ शब्ि-शब्ि न होकर एक ततिीर बन जाता है । जहाूँ शब्ि बोलते नहीं, र्र, कागज़ र्र उके री लाईनों से प्रवतचबंवबत होती है, छवि जीिन की शब्ि भािना से बढ़कर िृकय भािना रं ग भर िेती है, दकसी छौंक की तरह लगती है जो बेमज़ा, नीरस िाल को भी सरस, मज़ेिार और जायके िार बना िेती है ॥

कविता

मुरिे में मुतकान, जगाती चल कविता । जीिन को खुशहाल, बनाती चल कविता ॥ तेरे एक इशारे र्र, र्त्थर को भी प्राण वमले र्त्थर-र्त्थर फू ल, वखलाती चल कविता । इन आूँखों में दकतने, उजले सर्ने हैं दफर नभ में चाूँिनी, लुटाती चल कविता । विद्रोही तिर उठते हैं, तो उठने िे सच का के िल र्थ, दिखलाती चल कविता । तिेि,रक्त आूँसू से जीिन जो सींचे मानिता का र्ाठ, र्ढ़ाती चल कविता । ‘कवर्ल’ तृवषत जन्मों-जन्मों की प्यास बुझे वबछड़ी रह को रब से वमलाती चल कविता ॥

कविता यश हावसल करने के वलए, कष्ट उठाना ही र्ड़ता है । सर्नों की र्ूर्तप के वलए, नींि उड़ाना ही र्ड़ता है ॥ एक ज्योवत जो दिल में जगी, साथी ! उसको बुझने मत िेना हिा भले तूफ़ान बने, र्र, तुम नैया वहम्मत से खेना इक िततक र्र कभी सफलता, द्वार नहीं खोला करती है, िततक र्र िततक िे-िेकर, शोर मचाना ही र्ड़ता है ॥ श्रम सफलता की कुं जी है, वजसने भी यह जाना वजसने लाग लगाई मन में, और हुआ िीिाना दिन और रात की करठन तर्तया, से िुभापग्य सिा डरता है महाभाग्य को भी आकर खुि, भाग्य जगाना ही र्ड़ता है ॥ हो न वनराश, कहीं दकस कारण, यदि यश ना वमल र्ाये कोवशश करते रहने से ही, बंजर भी वखल जाये यत्न रहे, प्रयत्न रहे,तो, मानि आगे बढ़ जाता है ऊूँचे से ऊूँचे र्िपत को, शीश झुकाना ही र्ड़ता है ॥

कविता तुम्हारा “ठीक है “ कहना, कभी ठीक नहीं होता, मुझे र्ता है, ज्िार से तर्ता शरीर, वजसे तुमने र्ानी की र्रियों से, कर रखा है ठं डा, तादककोई भीतर की आग महसूस न कर सके मन मवततष्क में चलती िेिना की लहरों को अर्ने ओठों की हल्की मुतकान से, िबा रखा है और सोच वलया है, दकथमापमीटर, भी जाूँच नहीं सकता तुम्हारे अंिर उमड़ते ज्िालामुखी को क्योंदक- थमापमीटर के िल गमी या ठं डी ही बतलाता है अंिर के िु:ख-तार् को मार्ना उसके बस की बात नहीं है, दफर तुम्हारा तार्, तो तुमने तियं ही मुतकराकर बढ़ाया है न ििाईयों को खाया है, ना इंजेक्शन लगाया है, िु:ख िबाि लेर् जैसी चीजों को नहीं अर्नाया है क्योंदक – तुम, अर्ना िु:ख बाूँटना नहीं चाहते हाूँ, सचमुच बाूँटना नहीं चाहते क्योंदक- तुम्हारे अनुसार िु:ख का जीिन से सिा का नाता है िु:ख से ही जीिन र्ररर्क्व होता जाता है तुम्हारा ऐसा सोचना, मानना और चलना वबलकु ल ठीक नहीं है । बवल्क- एक धोखा है वजसने तुम्हें ठीक होने से रोका है तुम ठीक तब होते हो, जब प्रसन्न होते हो हूँसते हो, गाते हो, कभी वचढ़कर अर्ना आर्ा खोते हो तब तुम, ऊर्र ओढ़े हुए छद्म िेषों को उतारकर जीिन के सत्यम,वशिम और सुंिरम होते हो ॥

कविता समय की यह बेिफ़ाई, क्यों रही है । क्या कहूँ, जो िेिना, मैंने सही है ॥ वजस डाल र्र मैंन,े घरौंिा था बनाया मखमली सर्नों से, वजसको था सजाया जाने दकस तूफ़ान, का भय मानकर के आशाएूँ, वतनके की तरह, वगर-वगर ढ़ही हैं ॥ इस लड़ाई में, न मैंन,े हार मानी प्यास से तड़र्ा, मगर माूँगा न र्ानी अर्ने बलबूते र्े, मैं लड़ता रहूँगा मुझको सेना की ज़ररत, भी नहीं है ॥ वजसको चाहा मैंन,े मुझको कब वमला है बहुत कम अिसर हैं, जब हृिय वखला है र्र, वगला मुझको नहीं, यह चज़ंिगी जो शरबत न बन र्ाई, मगर मीठी िही है ॥ ओ समय ! इतना अकड़ मत, मोड िूग ूँ ा िेख लेना, तुझको र्ीछे, छोड़ िूग ूँ ा इक नया इवतहास, रचने के वलए अब प्रेरणा और भािना, मुझमें बही है ॥

चतुष्र्िी

नींि न आई आूँखों में, क्या था आर्की बातों में, जैसे बिली झुक आई, उजले-उजले र्रभातों में खुि को समझ, र्रख िेखा, सूरज-बिली-सा जीिन है, लेदकन इंद्रधनुष भी वखलता, इन्हीं मुलाकातों में ॥

कविता मैंने िेखा गुलाब के फू ल को, दकसी नासमझ बच्चे के , मोगरा कहने र्र, अर्ना रं ग-रर् या गंध तो त्यागते और न ही, गुतसे से लाल-र्ीले होते क्योंदक गुलाब-गुलाब होता है उसे रोज़, गुल, शतर्त्री, रक्तगंधा जैसे सैकड़ों नाम से र्ुकारने र्र भी, िह बिल नहीं जाता लेदकन इंसान के िल वहन्िू मुसलमान र्ुकारने र्र, दकतना बिल जाता है खान-र्ान, बोली-भाषा, ऊूँच-नीच, रं ग-नतल के भेिों में उलझ जाता है जैसे इंसान न होकर शब्िों की मात्राएूँ हैं जो ज़रा-सा अंतर र्ाते ही अथप का अनथप कर लेती हैं ॥

कविता चल दफर कोई तिप्न सजायें । व्यवथत हृिय को, मोहनेिाले जाल में दफर से फूँ से- फूँ सायें ॥ अच्छा है िु:ख में रोने से, दकसी तिप्न में फूँ सना बुझे िीर् को जागृत रखना, चाह की राह में धूँसना चमकीले सर्नों को बोना, अनायास ही हूँसना मन की मचलती लहरों र्र, दफर से डू ब,ें दफर से उतरायें ॥ वजसको भी तू सत्य मानता, िो तो के िल छल है कभी न बुझ र्ाये ऐसी, मृगतृष्णा है, मृग-जल है दफर भी इसमें दिव्य शवक्त है, जािू जैसा बल है दफर से ललक-ललक कु छ चाहें, दफर से जी ललचायें ॥ जीिन है संघषप तो, दफर, तकलीफ़ों से क्यों डरना वबजली वमलती रहे इसवलए, वबजली का वबल भरना कु छ आशाएूँ जीवित रखना, कु छ िािे खुि से करना मूल्य चुकाया है हमने, तो चीज़ों को उर्योग में लायें ॥ वजतनी यथाशवक्त हो जाये, कमप खुशी से करना अखंड ज्योवत के वलए ज़ररी, तेल दिये में भरना ओठों र्र शुभ शब्ि, हृिय में, बहे प्रेम का झरना िु:ख की लहर बिल सकती है, यदि कहकहें लगायें ॥

कविता बोझ सर से फें क इक-िो, गीत गाने िो ज़रा । र्ास से ताज़ी हिा को, मीत आने िो ज़रा ॥ है बड़ा यह िोष, जीिन में सिा, चंचल रहा सुख और शाश्वत सत्य-सा, वनिल तथा वनशर्ल रहा िुख इतने समय तक साथ मेरे, प्रेमर्ूिपक जो रहा है, क्यों मैं उसका साथ छोड़ूूँ , क्यों रहूँ मैं उससे बेमुख ॥ आूँख से झरकर मुझे, संगीत लाने िो ज़रा ॥ क्या हुआ जो बोझ से, व्याकु ल हुआ है, आज का नर असहाय खुि को समझता है और िेखे होके कातर एक धीरज मन में रख, बिलेगी सारी व्यितथा एक र्ल थोड़ा ठहर, वनभीक बन, ना बन यूं कायर । संक्रमण यह काल सर से, बीत जाने िो ज़रा ॥ कौन गहरे भेि मन के , ठीक से र्हचानता है कब हो तोला, कब हो माशा, कौन दफ़तरत जानता है िाह में ज्यों आह है, और आह में जैसे हो आहा, र्ल में बिलता, खेल यह ,संसार सारा मानता है । अर्नी बाज़ी आज मुझको, जीत जाने िो ज़रा ॥

चतुष्र्िी

नफ़रतों से मुक्त यह संसार होना चावहए । प्यार की सबको ज़ररत, प्यार होना चावहए ॥ तुम कहो मैं मान जाऊूँ, मैं कहूँ तुम मान लो, इस तरह कु छ खुशनुमा, व्यिहार होना चावहए ।

चतुष्र्िी तू बंिा निाज़ है, तू हर बंिे की, बात रखता है तू बड़े जतन से, अर्ने बच्चों को, साथ रखता है जब कभी रठ के , तक़िीर चली जाती है तू मसीहा बनके ‘कवर्ल’ सर र्े, हाथ रखता है ॥

कविता प्यार का अर्मान मत कर, प्यार का सम्मान कर । िासना के बीज मत बो, अवतमता का ध्यान कर ॥ िेह में िानि बसा, मत छेड़कर उसको जगा जग गया तो शर्तपया, िेते ही जायेगा िगा अर्ने हाथों अर्ना ही, चमन ना िीरान कर ॥ प्रेम को र्ूजा बना, उत्कषप की कर कामना दिल के चंचल भाि का, विश्वास से कर सामना श्रद्ा अर्नी रख अवड़ग, मन को रोशनिान कर ॥ प्रेम में नहीं कलुषता, प्रेम र्ािन चीज़ है प्रेम वजसने भी वनबाहा, बना दिल अज़ीज़ है त्याग-तार्-शुभ भाि से, प्रेम का अनुष्ठान कर ॥

कविता साथ वनभाना है हमको, धरती से आकाश तलक । ििप बूँटाना है हमको, जीिन की हर साूँस तलक ॥ जगत प्रकावशत रखने ख़ावतर, सूरज जलता जाता है, सब कु छ सहन दकए चलता है, निजीिन की आस तलक ॥ वजसने प्यार दकया, उसने ही, जाना दिल की हालत को, विरह की तड़र्न से लेकर, मधुर वमलन अहसास तलक ॥ ऐसा नहीं दक मानि ही, वजये है प्रेम की प्यास वलए, र्रमेश्वर भी चज़ंिा है, श्रद्ा-भवक्त-विश्वास तलक ॥ हूँसी-खुशी से रहें अगर तो, जग सुंिरतम बन जाए रोटी, िस्त्र,वनिास से आगे, सर्नों के अवभलाष तलक ॥ प्यार में है विततार जो वबन्िु, को भी वसन्धु बनाता है सुख-िु:ख लहरें आती-जाती, र्तझड़ से मधुमास तलक ॥

चतुष्र्िी क्यों उलझन में, रहता है मन । जब तेरा, संघषप है र्ािन ॥ हार-जीत होती रहती है, सागर की लहरों-सा जीिन ॥

चतुष्र्िी

ना वनराश हो िेख समय को । खोने मत िे अर्नी लय को ॥ रख विश्वास अर्ने र्ौरुष र्र, र्ूणप करे गा हर वनिय को ॥

चतुष्र्िी दफर मुझे तन्हाईयों ने घेरा है । दफर कहीं खो गया सिेरा है ॥ दफर मेरे दिल में, बस गया जंगल दफर उन्हीं र्ंवछयों का डेरा है ॥

चतुष्र्िी

धूल-धूसररत चज़ंिगी को, जी रहे हैं । िु:ख भरे आूँस,ू खुशी से, र्ी रहे हैं ॥ काूँर्ते हैं हाथ, र्र दिल में सुकूूँ है, इंसावनयत के चीथड़ों को, सी रहे हैं ॥

चतुष्र्िी

चुभती-जलती बातों से, क्या कु छ खोया, क्या कु छ र्ाया । अर्ने अहंकार को लेकर, हमने सुनहले र्ल को गूँिाया । तुम हारो और मैं जीतू,ूँ आिशप यही ले लड़ते रहे, जब तक हम समझौता करते, िक़्त ने हमको ठु कराया ॥

चतुष्र्िी

आूँखों की कोर में जो, आूँसू न बह सका । दिल भी तड़र्-तड़र् के , वजसको न कह सका । खामोश होके तुमने, िु;ख-ििप सहे मेरे प्यार का मसीहा, वजसको न सह सका ॥

बाल कविता

कविता सुनने, सब जन आओ । लेदकन, र्हले, ताली बजाओ ॥ एक था लंगड़ा, एक था अंधा िोनों वभखारी, चले न धंधा । लंगड़ा आगे चल ना र्ाये अंधा हरिम ठोकर खाये । र्ड़े-र्ड़े िो सोच रहे थे अर्ने बाल को नोच रहे थे । लंगड़े को झट से कु छ सूझा उसने अंधे से ये र्ूछा । मैं लंगड़ा, मैं चल नहीं र्ाता तू अंधा, तू संभल न र्ाता । तू मुझको कांधे र्े वबठा ले, मेरे संग तू जोड़ी बना ले । सच्ची राह दिखाऊूँगा मैं वगरने से तुझे बचाऊूँगा मैं । तेरे र्ैर से सैर करें गे इक िूजे का र्ेट भरें गे । अंधे ने लंगड़े की मानी बिल गई उनकी चज़ंिगानी । अंधे और लंगड़े का जोड़ा िौड़ र्ड़ा दक़तमत का घोड़ा । अच्छा खाने–र्ीने लगे सुखमय जीिन जीने लगे । ख़त्म कहानी, ख़त्म तमाशा िेता हूँ, र्र, इक र्ररभाषा । ज्ञान के वबना, कमप है अंधा कमप के वबना, ज्ञान है र्ंगुला खुि को समझिार है कहता र्र, मानि सचमुच यह भूला । दक- ज्ञान-कमप के संगम से ही, तिगप बनेगा घर संसार । खुशहाली के फू ल वखलेंगे, जीिन होगा सिा बहार ॥

कविता साक्षी है सागर नीलाभ अंबर मलयज समीर तुम्हारे -मेरे प्रीत का ॥ साक्षी हैं आूँखें हृिय की र्ाूँखें होठों के फू ल तुम्हारे -मेरे प्रीत का ॥ साक्षी र्ररिेश उड़ते हुए के श र्ुलदकत तर्शप तुम्हारे -मेरे प्रीत का ॥ साक्षी ये रात प्यारी सौगात हाथों में हाथ तुम्हारे -मेरे प्रीत का ॥ साक्षी ये जीिन सराबोर तन-मन तृप्त होते प्राण तुम्हारे -मेरे प्रीत का ॥

कविता मैं तितंत्रता दििस हूँ, साक्षी हूँ उन सभी का, जो अर्नी तितंत्रता के वलए, सहते रहे हर ज़ुल्म, चलते रहे अविर्थ र्र, भले ही खाते रहे, रोरटयाूँ घास की, महाराणा प्रतार् की तरह, झेलते रहीं गोवलयों की बौछार, िीरांगना लक्ष्मीबाई की तरह, मैं साक्षी हूँ उन सभी लोगों का, और साक्षी हूँ उन करोड़ों नर-नाररयों का, वजनकी आूँखों ने िेखे थे रामराज्य के सर्ने, वजसे करने को साकार, न िेखा उन्होंने बीिी, न बच्चे, न र्ररिार, बस, िेशप्रेम को सीने से लगाये, घूमते रहे आज़ािी के िीिाने, अख़बारों का वबततर बना, र्त्थरों र्र सोते रहे, अर्ने सत्याग्रह र्र, प्राण तक खोते रहे बंिक ू , लाठी, जेल, फाूँसी मौत अर्नाते रहे, वहन्िू-मुवतलम-वसख सारे , सर को कटिाते रहे, आूँधी-तूफ़ान, िषाप-वबजली, सब से टकराते रहे, र्ैगाम-ए-इंक़लाब को, घर-घर तक र्हुूँचाते रहे गाूँधी, सुभाष, नेहर, आंबेडकर के जैसे अलख जगाते रहे, रक्त की एक-एक बूूँि, ितन र्र लुटाते रहे, सींचते रहे, अर्ने आूँसूओं और र्सीने से, भव्य भारत की भव्य कल्र्ना को, जो रह गए हैं अब भी अधूरे, आज़ािी के 75 िषों के बाि भी, शायि बुढ़ा गये हैं, िेखते-िेखते सर्ने, चक्रिती भरत के अखंड भारत साम्राज्य के , वजसे खंड-खंड में, हो रहा है महाभारत, राष्ट्र को अब जैसे धृतराष्ट्र चलाने लगे हैं, भाई-भतीजािाि की फसलें बढ़ाने लगे हैं,

तोड़ने लगे हैं, िेश से दकए िािों को, जावतिाि, प्रांतिाि, संप्रिायिाि, और न जाने दकतने िाि-वििाि फै लाने लगे हैं, साक्षी हूँ मैं, दकतने ही भ्रष्टाचारों का, अत्याचारों का, बलात्कारों का दक िेखा भी नहीं जाता अब, सहा भी नहीं जाता अब, हर ड्योढ़ी र्र, िेश का िीर अवभमन्यु, न्याय और मानिता के हेतु लड़ता तो नज़र आता है, र्र, अर्ने ही बंधु-बांधिों के हाथों, मुूँह की खाता है, मरणासन्न हो छटर्टाता है, टूटकर वबखरने लगते हैं, तिप्न शहीिों के , जो िेश की सुरक्षा के वलए, मर-वमटे, हज़ारों कारवगल, इंडो-र्ाक, इंडो-चाइना के बॉडपरों र्र, तब सोचता हूँ, उन िीर जिानों के बारे में, जो आज भी ख़ून जमानेिाली ठं वड़यों में, ओला-िृवष्टयों में, झुलसाती गर्मपयों में, बमों के धुओं में, आग उगलती तोर्ों में, अर्ने िेश प्रेम की मशाल वलए, आज भी अवड़ग खड़े हैं, सतकप और चुतत प्रहरी हैं, माूँगता हूँ, ऐसे ही िफ़ािारों, ईमानिारों, तथा िेश से प्रेम करने िाले, भगतचसंह जैसे नौजिानों की नौजिानी, ययावत की तरह, तादक तितंत्रता की मशाल को, वमलता रहे वचरयौिन ॥

कविता अरे मन ! सुखमय कर संसार । चार दिनों का ये है जीिन, कर ले सबसे प्यार ॥ ईष्याप-िैर से किी ले ले, सत्य-प्रेम से बिी ले ले, मानिता की घुिी ले ले छोड़ घृणा-तकरार ॥ क्यों तुझको अवभमान बड़ा है, नाहक अर्नी वज़ि र्े अड़ा है मूरख बनकर काहे, र्ड़ा है कु छ तो सोच-विचार ॥ माना तेरा सर्ना टूटा, भाग्य न जाने, क्यूूँ है रठा मन अंिर है टूटा-फू टा वमली आज दफर हार ॥ िु:ख के बािल, छंट जायेंगे इक ठोकर में बंट जायेंगे वहम्मत रख, सब हट जायेंगे होगी जयजयकार ॥

कविता खुि को ज़रा बिल इन्सान || करनी तेरी िेख-िेख कर, मावलक भी तुझसे हैरान || प्रभु ने िी यह वनमपल काया उसर्र कै सी मैल चढ़ाया जावत-िणप-मज़हब का मुखौटा र्हन के कै सा तिाूँग रचाया भूल गया असली र्हचान || खुि को ज़रा बिल इन्सान || रब ने तुझको इन्सान बनाया र्र, तुझमें शैतान समाया एक सूई भर ज़मी के ख़ावतर लड़ा तियं औरों को लड़ाया व्यथप गूँिाईं अर्नी जान || खुि को ज़रा बिल इन्सान || भूखे को खाना न वखलाया प्यासे को र्ानी न वर्लाया हूँसते हुए चेहरों को हमेशा बड़े जतन से, बहुत रुलाया छीन ली ओंठों की मुतकान || खुि को ज़रा बिल इन्सान || सोच-सोच कर बम ही बनाया जहाूँ-जहाूँ र्र उसे वगराया एक कली न वखली िहाूँ र्र र्त्ता ना कोई डाल र्े आया सारा शहर हुआ शमशान || खुि को ज़रा बिल इन्सान || संतों ने दकतना समझाया मानिता का र्थ दिखलाया लेदकन अर्नी अकड़ के कारण बार-बार बस धोखा खाया अब तो कर अर्ना कल्याण || खुि को ज़रा बिल इन्सान ||

तेरी रोज़ िीिाली होगी मन का िीर् जला ले मानि, तेरी रोज़ िीिाली होगी । राम विराजेंगे इस घट में, नहीं अमािस काली होगी ॥ वजन लोगों ने राम को अर्ने, हृिय से िनिास दिया है उन लोगों ने अर्ने हाथों, अर्ना सत्यानाश दकया है । जैसे के िल एक मंथरा, र्ूरी अयोध्या र्र थी भारी , िैसे ठवगनी माया ने, सारी िुवनया को फाूँस वलया है ॥ बचा अगर इस मकड़जाल से, तेरी शान वनराली होगी ॥ प्रभू राम से नेह जोड़ ले, मयापिा मन में आयेगी, प्रेम,नम्रता,सहनशीलता, विशालता मन को भायेगी । तू एक सहारा लेकर इसका, एक र्ाूँि भी ज़मीं र्े रखिे, रािण की सारी सेना भी, तेरा कु छ ना कर र्ायेगी ॥ रामराज्य के आ जाने से, जीिन में खुशहाली होगी ॥ वजसने अर्ना मान वमटाया, िो ही तो हनुमान हुआ है, प्रभु आज्ञा को माननेिाला, िेखो भरत महान हुआ है इनके के िल छू लेने से, र्त्थर भी जीिन हैं र्ाते, इनकी कृ र्ा-िृवष्ट के कारण, हम सबका कल्याण हुआ है इनके आिशों र्े चलें, तो भवक्त गौरिशाली होगी ॥ अभी बहुत से िीर् बुझे हैं, नूर-ए-इलाही भरना है, चाहे झोर्ड़ी, चाहे महल हो, सबको जगमग करना है । द्वेष वमटे, िुख-क्लेश वमटे, मानि में वमलितपन आये, धरा प्रेममय करने का, संकल्र् हृिय में धरना है ॥ ’कवर्ल’ सभी को सुख िेने की,ये सुन्िर कायप-प्रणाली होगी ॥

कविता यूूँ दकसी को िोष मत िे ।। होगी कोई तो बात, वजसकी िजह से आया नहीं िो, होगा कोई तो काम, फूँ स वजसमें वनकल र्ाया नहीं िो शब्ि िो, सम्िेिना के , बोल दिखलाया नहीं िो आज िुख के समय, मेरे िुख में अकु लाया नहीं िो । अरे ! प्यार र्ूरा ना वमला, तो व्यथप अर्ना रोष मत िे ॥ िो नहीं आया तो हमने, मन के घोड़े क्यों भगाये घर र्े अर्ने बैठकर, अवभयोग इतने क्यों लगाये जाने क्यों रह-रह के हमने, तोर् खुल-खुल के िगाये करते रहे बातें अनगपल, वबना सि्–बुवद् जगाये अरे ! वबना सोचे या विचारे , व्यथप का उि-घोष मत िे ॥ क्या र्ता क्या राज़, िह सीने में अर्ने है िबाये जाने क्या तकलीफ है, जो झेलता है वबन बताये कौन-सी उलझन है मन में, जो रही उसको सताये र्हाड़ जैसी चुप्र्ी लेदकन, बह रही हो भािनाये अरे ! व्यथा के संतार् से यूूँ , हृिय का संतोष मत िे ॥

कविता कौन चुप्र्ी तोड़ता है ॥ प्रेम में मजबूर होकर, कौन गुतसा छोड़ता है ॥

एक िािा जो दकया, उसको नहीं र्ूरा वनभाया और िे झूठे दिलासे, इक तमाशा क्यों बनाया वजस जगह मुझको ज़ररत, उस जगह र्र क्यों न आया इस विर्ि में आज िेखूूँ , कौन मुूँह को मोड़ता है ॥ र्ास आने को कहा, तो िूरी तुमने क्यों बनाई हृिय दिखलाने कहा, तो र्ीठ तुमने क्यों दिखाई आवत्मक सम्बन्ध में भी, रीत उल्टी क्यों वनभाई िोष दकसका, कौन िोषी, कौन माथा फोड़ता है ॥

जानकर मेरी व्यथा भी, इस तरह उसका न आना, और दफर मासूवमयत से, कर दिया कोई बहाना सोच में मैं हूँ दक, उसको आज तक मैंने न जाना प्रश्न का अम्बार जैसे, हृिय में हल गोड़ता है ॥ एक चाहत के वलये, तुमने मुझे दकतना रलाया सब समर्पण करके भी,तुम ही कहो,मैंने क्या र्ाया रठकर बैठा अलग, तो र्ास आकर ना मनाया िेखता हूँ, ईश ही, कै से दिलों को जोड़ता है ॥

कविता

मैं, कविता से हार गया । अर्नी इस कमज़ोरी को सरे -आम तिीकार गया ॥ जब चाहूँ , तब नहीं वमले कै से ? कवि का हृिय वखले करूँ मैं, दकससे वशकिे-वगले जब अर्ना, सोच-विचार गया ॥ रात-रात, भर जाग रहा वनद्रा-सुख को, त्याग रहा ईश्वर से, कृ र्ा माूँग रहा जैसे, जीिन आधार गया ॥ भािों के कई, समुद्र बहे, झंझािातों के , घात सहे डू बे जाकर, तब मोती गहे र्र आूँसू , कह संसार गया ॥ मैं मानिता, ले आने चला वजससे मानि का होिे भला विषयों से कोई न जाये छला र्र, मुझे विकार ही मार गया ॥ इसमें मेरा कोई िोष नहीं मुझमें भािों का कोष नहीं र्र वलखे वबना संतोष नहीं जो है, िह सब-कु छ िार गया ॥

कविता तुम कवि को समझने का िािा करते हो, तो, तुम भूल करते हो कवि को समझना, कवि बनने जैसा है । शायि उससे भी, कहीं ऊर्र क्योंदक- हर दिल, कवि नहीं होता, हर धड़कन से, कविता नहीं वनकलती हर शब्ि से, ज़ररी भाि नहीं वनकलता कभी-कभी अर्शब्ि भी, सुंिर शब्िों से बढ़कर होते हैं । कभी-कभी इवडयट, इंटेलीजेंट से बढ़कर होता है । दफर, कवि का शब्ि, अर्शब्ि नहीं होता, जैसे आकाश से ठु कराई तिावत बूूँि, सींर् के अंधकार में मौन र्ड़ी रहती है, सूयप की दकरणों से करोड़ों मील िूर, सागर के अंधकारमाय संसार में, एक सूरज की तरह चमकती रहती है । कवि बहुत कु छ िे सकता है, यदि, तुम लेना चाहो क्योंदक- कवि तुम्हीं से लेकर तुम्हीं को िे िेता है, सत्यम, वशिम और सुंिरम करके । भले िह अर्ने अंधकारमय जीिन की, कु छ कटुतम सच्चाईयों को काव्य-धारा में, सुंिरता से न उके र र्ाता हो, दकन्तु, विश्व की उज्ज्िलतम अंतरात्मा को, अिकय वनखार जाता है । कवि से सारा संसार, अर्ने आर् को, िर्पण के सामने खड़ा र्ाता है ॥

कविता नफ़रतों को छोड़, साथी ! प्यार कर बस प्यार कर । चार दिन चज़ंिगी, ना, बेिज़ह बेकार कर ॥ माना तुझे अर्मान की, लर्टों में िुवनया ने जलाया, तेरे दिल के भाि को, उर्हास में जमकर उड़ाया िेखकर तेरी विफलता, सब ओर से तुझको सताया प्रवतशोध की ज्िाला में ना जल, प्रेम की बौछार कर ॥ समझ लहरों की तरह है, हर दकसी की चज़ंिगानी आज है उतार ज़्यािा, तो, बढ़ेगी, कल रिानी दिन-रात तो होते रहे, र्र, कब रुकी धरती िीिानी वनयवत तो होकर रहेगी, इन्कार कर, इक़रार कर ॥ िीर् आशा के जला, वशकिा न कर अूँवधयार से, िेिना दिल से लगा, थर्की िे िु:ख को प्यार से, प्रेम का र्थ ना बिल, इन छोटी-मोटी हार से कल्र्ना की तरह प्यारे , प्यार का विततार कर ॥ दफर सजा सर्ने सुनहले, िे जगत को क्रांती प्यार के बल र्र वमलेगी, जग को सुख और शांती वमटेंगी िुभापिनायें और वमटेंगी भ्रांती, यह भागीरथ यत्न है , तो भी, इसे तिीकार कर ॥ प्यार का िेखो मसीहा, प्यार को वसखला रहा, प्यार करने का तरीक़ा, प्यार से बतला रहा प्यार से सब कु छ वमलेगा, िेख लो दिखला रहा प्यार के सौंियप से, इस, विश्व का शृंगार कर ॥

बाल नारटका एक बार, एक हाथ की उूँ गवलयाूँ लड़ने लगीं मैं बड़ी हूँ , मैं श्रेष्ठ हूँ, सबसे कहने लगीं कवनवष्ठका बोली,“ मुझे न कहना कानी ऊंगली, मुझे न कहना छोटी, जो मुझको है छोटी समझता, उसकी बुवद् मोटी नंबर िन की ऊंगली हूँ मैं , कर िूूँ सबकी छु िी चर्ंकी प्रॉवमस कर ले मुझसे, नहीं तो करले कु िी ” अनावमका बोली, “ ए, वछगुनी ! बंि कर अर्नी बकिास र्ूरे हाथ में मेरी जगह है, एकिम खासमखास बता, मूँगनी में दकस ऊंगली को, वमलता आिर-सम्मान , िेचडंग ररं ग र्हनाते दकसमें, क्या नहीं है, आर्को ज्ञान ” मध्यमा बोली, “ मैं बड़ी -मैं बड़ी कहने से, नहीं होती कोई बड़ी मैं बड़ी सबको है मालूम, नहीं ss मालूम , तो होके िेखले खड़ी मत कर इतनी हड़बड़ी, समझी, अनावमका बड़बड़ी ।” तजपनी बोली, “ बड़ी हुई तो क्या हुई, बस बड़ा है तेरा नाम, र्ूरी िुवनया जानती, मुझसे होते हैं काम । मैं बताऊूँ, मैं समझाऊूँ, मैं ही दिखाऊूँ राह, मैं सरकार बनाने का, बनती हूँ गिाह बताओ, चुनाि की तयाही, दकस र्र लगती है दकसके बल र्र, सरकार चलती और बिलती है ।” अूँगूठा बोला, “ तुम सारी ऊूँगवलयाूँ, ठें गे से, मैं हूँ राजा, तुम सब नौकरावनयाूँ, ठें गे से मैं ही इज्ज़त करिाता हूँ मैं ही बेइज्ज़ती करिाता हूँ । मैं ही हूँ, हाथ की र्हली ऊंगली, तुम बाि की वगनवतयाूँ, ठें गे से (बाकी उूँ गवलयाूँ ) हाूँ .. हाूँ .. तुम हो अूँगूठा छार्, ठें गे से जाके अर्ना रातता नार्, ठें गे से अरे ...होते सारे काम ऊंगली से ..ऊंगली से ..ऊंगली से आर्स में लड़ने लगीं, दफर से झगड़ने लगीं ,

तभी एक आिाज़ आई , एक वगलास र्ानी तो वर्ला िो भाई हर ऊंगली ने दकया प्रयास र्र र्ानी का वगरा वगलास हुई बहुत सब शमपशार, तब मावलक ने कहा, “लड़ो नहीं, सब करो प्यार । ईश्वर ने तुम्हें बनाया है, दिव्य गुणों से तुम्हें सजाया है । र्र, अके ले तो ठोकर खाओगे बस, साथ में ही सुख र्ाओगे । वमलजुल कर रहना सीखो प्रेम की बोली कहना सीखो इक िूजे को सहना सीखो सहज भाि में बहना सीखो । सीखो .... सीखो ...सीखो....” तो क्या सीखा...... बोलो बच्चों, क्या सीखा वमलजुल कर रहना सीखा प्रेम की बोली कहना सीखा इक-िूजे को सहना सीखा सहज भाि में बहना सीखा

कविता

तेरी िुवनया, मेरी िुवनया, करता रहता मानि मन है । जब एक है मावलक, एक है ख़ावलक, एक से वमला हमें जीिन है । एक है िाता, एक विधाता, एक है धरती, एक गगन है । एक को जानो, एक को मानो, एक से आता अर्नार्न है । एक के साधे, सब सध जाते, एक से हर र्ल नेह लगायें ॥ अर्नेर्न का भाि जगायें , सारी िुवनया एक बनायें ॥ अर्नार्न हर िैर वमटाये, अर्नार्न इंसान बनाये, अर्नार्न िु:ख-ििप भगाये, अर्नार्न मुतकान जगाये काूँटा भी रक्षक बन जाये, फू ल जो काूँटें को अर्नाये अर्नेर्न की ताकत से, एक-एक ग्यारह हो जाये । यही बात हम खुि भी सीखें, यही बात सबको बतलायें ॥ अर्नेर्न का भाि जगायें , सारी िुवनया एक बनायें ॥ अर्नेर्न की डोरी से, भगिान तियूँ बूँध जाते हैं छप्र्न भोग त्यागकर मोहन, साग वििुर घर खाते हैं । अर्नेर्न का भाि, जो लेकर, भगिन के िर आते हैं िो मुट्ठी तान्िुल के बिले, िो जहाूँ की खुवशयाूँ र्ाते हैं । “कवर्ल”ये िाता सारे जहाूँ का, इनसे अर्ना अर्नत्ि वनभायें ॥ अर्नेर्न का भाि जगायें, सारी िुवनया एक बनायें ॥

कविता लेखनी चुर्चार् मत हो, आज मैं तन्हाूँ अके ला । िाणी हुई वन:शब्ि लेदकन, मन में फै ला िुख-झमेला ॥ दकससे दिल की बात को, जाकर सुनाऊूँ गहरे दिल के घाि, जा दकसको दिखाऊूँ कौन है जो आज समझेगा मुझे, दकसकी गोिी में र्डू ,ूँ आूँसू बहाऊूँ । तू ही कह, िुभापग्य ने कै सा धके ला ॥ क्या िुखों के वलए ही, मानि बना है, क्यों अन्धेरा रोशनी से भी घना है क्यों सोच सुख का तिप्न बन जाता बता, क्या सुख का मानि मन में भी आना मना है । व्यतत भी और ध्ितत भी, जीिन की बेला ॥ क्या करूँ वजससे मेरा, िुख-ििप कम हो, हूँस न र्ाऊूँ, चल, कहीं कु छ, आूँख नम हो तू अके ली, मैं अके ला, और यह संसार सूना थाम मेरा हाथ, मैं-तुम से चलो,अब आज हम हों दफर सजायें सृवष्ट में, सुख-िु:ख भरा रं गीन खेला ॥

कविता जब तुम्हारी आूँखों में, अर्नी आूँखों की प्यास िेखता हूँ, मेरे दिल की धड़कन, तेज़ हो जाती है । वखल उठता है रोम-रोम, महक उठता है, मेरे मन का आूँगन तुम्हारे प्यार की भीनी-भीनी खुकबू से, जो रह-रह कर, शीतल झोंकों की तरह, गुिगुिा जातीं हैं, मेरे ख़्िाबों और ख़्यालों को, और वझलवमलाने लगता है, तुम्हारा रर् सलोना वमल जाते हैं नयन, बहक उठता है मन, और रह जाते हैं हम, वसफ़प , तुम और मैं, मैं और तुम ॥

कविता अर्नी उिास-उिास सी नज़रों से, जब लाचार हो तुम, मुझे िेखती हो, सच कहता हूँ, मैं जी उठता हूँ और िेखने लगता हूँ, कई सर्ने, कई अरमान जगते हैं, दिल में वसफ़प , तुम्हारे ओंठों र्र मुतकान लाने के वलए, तब, तड़र् उठती है, एक लंबी ख़ामोशी, जो तुम्हारे और मेरे िरम्यान है, वनकल र्ड़ती है व्यथा, कभी तुम्हारी आूँखों से, कभी मेरी आूँखों से, दक- काश ! हम, एक तन और एक मन होते ॥

कविता धड़कते दिल से तुम्हारा यूूँ क़रीब आना, और चुर्के -चुर्के मेरे बाहों में वसमटना, जैसे विशाल आकाश की आगोश में, धरती की वलर्टना । जैसे सागर से सीने र्र, सररता का मचलना, बना िेता है िीिाना मुझ,े तुम्हारा और तुम्हारी नज़ाकत का, शमप से लजाई आूँखों का, लाल गुलाब-से सुख़प होते ओंठों का, बहकते तिांसों की डोर से, छलक़ते प्रेम रस का, वजसमें भीजकर, न तुम रह जाती हो, न मैं रह जाता हूँ । रह जाता है, वसफ़प एक बंधन !

कविता मैं और तुम्हारी याि, साथ-साथ चलते हैं , सागर की लहराती मौजों में, र्िन के सरसराते झोंकों में, हरी-भरी िादियों में र्हाड़ों की खूबसूरत दफज़ाओं में, भाग-िौड़ के माहौल में, ख़्िाब और ख़्याल में, गूूँजती है तुम्हारी आिाज़, मेरे जेहन में, कौंध जाती है तुम्हारी सूरत, तुम्हारी अिा ! तुम्हारा प्यार ! लगता है जैसे तुम, मेरी तिांसों में रची-बसी हो, मेरे दिल की धड़कन की तरह ॥

व्यंग्य कविता आओ भ्रष्टाचार वनभायें । अर्ने भले में सबका भला है, बार-बार िोहरायें ।। िफ़्तर ख़ाला जी का घर है, जब मन चाहे, आयें-जायें बॉस के चमचे बने रहें दफर, र्ूरी कड़ाही में लहरायें भ्रष्ट अचार बहुत मीठा है, जीभर खायें और वखलायें । जो भी भ्रष्टाचार न करता, उसके वखलाफ़ ररर्ोटप वलखायें । वबन ररश्वत कै से है चज़ंिा, सतकप विभाग से जाूँच करायें ।। काम के नाम र्े गाड़ी माूँग,े र्ररिार सवहत वर्कवनक र्र जायें मोफतलाल बनकर भईया, हर तरफ जुगाड़ लगायें । सुविधा शुल्क तो अर्ना हक़ है, कभी माूँगने में न लजायें वमल बाूँट कर खाने से, सबकी सेहत बनती जाये । भ्रष्टाचार समाज सेिा है, वनधपन को धनिान बनाये ।। भ्रष्टाचार की नीवत से, प्रॉडक्शन बढ़ जाता है कामचोर भी काम है करता, काम में दिल को लगाता है सेिा में तत्र्र रहता है, लोड से ना घबराता है छु िी के दिन भी काम करे और शाम को मौज़ मनाता है । भ्रष्टाचार के दकतने फ़ायिे, जो भूले उन्हें याि दिलायें ।। थोड़े से रुर्यों की लालच, भ्रष्ट तुझे कर डालेगी तेरी इज़्ज़त, तेरी ग्रेज्युटी, एक ही र्ल में खा लेगी सारी मौज़ वनकल जाएगी, जब चाज़पशीट वनकालेगी कोई भी र्ेनाल्टी वमले, जीिन भर तुझको सालेगी । अभी समय है, नींि से जागें, अर्नी बुवद्-वििेक जगायें ।। आओ भ्रष्टाचार वमटायें । आओ भ्रष्टाचार वमटायें ।। भ्रष्टाचार इक प्रिूषण है, इससे अर्ने मन को बचायें ।।

मुक्तक अवभलाषाएूँ मन में दकतनी, आती हैं, जाती हैं जलविहीन बिली के जैस,े के िल तरसाती हैं यह हो जाये, िह हो जाये, सर्ने दिखलाती हैं प्यास नहीं जीिन की बुझती, के िल भटकाती है ॥

मुक्तक

दकतने झूठ और सच वमलते हैं, जीिन र्थ र्र चलते-चलते दकतने वशखर चढ़े सुबह को, उतरे शाम को ढलते-ढलते दकतनी आशाएूँ जगती हैं, दकतनी जग कर बुझ जातीं हैं दकतने ख़्िाब टूट हैं जाते, इन आूँखों को मलते-मलते ॥

मुक्तक दकतने कटु िचनों से मेरा, करते हो तुम तिागत जाने कै से, कोमल हृिय, कर िेते हो आहत वबन जाने, वबन समझ- बूझ,े हथकवड़याूँ र्हना िेते हो, मैं अर्राधी बन जाता हूँ, िेख तुम्हारी आित ॥

मुक्तक कोई मेरे दिल के कर टुकड़े, मुझे रोने नहीं िेता, करके बेचन ै रातों में, मुझे सोने नहीं िेता सुबह और शाम, वजसका नाम ले, आहें मैं भरता हूँ, िो मेरा होके भी, अर्ना, मुझे होने नहीं िेता ॥

कविता चल अर्नी मुतकान सजा, जीिन का निगान सजा रोकर मत हलकान हो प्यारे , दफर से लय और तान सजा ॥ माना िुख से जूझ रहा है कोई र्थ ना सूझ रहा है तेरा भाग्य अबूझ रहा है दफर भी चल, अरमान सजा ॥ माना सर र्र बोझ बहुत है, जश्न से ज़्यािा सोज़ बहुत है ख़ोज ज़रा तो मौज बहुत है सफ़र का बस सामान सजा ॥ माना तेरा िौर नहीं है तू सबका वसरमौर नहीं है र्र, तुझसा कोई और नहीं है ख़ुि अर्ना सम्मान सजा ॥ माना लहर–लहर हलचल है जीिन का हर र्ल बेकल है दफर भी मधुर-मधुर कल-कल है तू भी नि र्ररधान सजा ॥

हातय कविता दफर र्ैसों की तंगी है । दफर र्ैसों की तंगी है ॥ टुकड़ों-टुकड़ों में र्लनेिाली, चज़ंिगी भी क्या वभखमंगी हैं ॥

नहीं बैंक बैलेन्स,जो साहस िेता हो, नहीं िोतत दिलिार जो ढाढ़स िेता हो, नहीं कोई व्यार्ार, जो बोनस िेता हो, नहीं है िेिनहार, जो िार्स िेता हो, र्ल-र्ल दकतने रं ग बिलती, िुवनया ये बहुरं गी है ॥ दफर र्ैसों की तंगी है । दफर र्ैसों की तंगी है ॥ र्ूरणमासी चाूँि-सा िेतन आता है , धीरे -धीरे घटते-घटते जाता है र्ंद्रह दिन में, शून्य हो जाता खाता है बाकी महीना ख़ून के आूँसू रुलाता है दकतने मीत शत्रु हो जाते , सब िौलत के संगी हैं ॥ दफर र्ैसों की तंगी है । दफर र्ैसों की तंगी है ॥ बीिी-बच्चे, करते झगड़ा, दकसी को गहने, दकसी को कर्ड़ा, चज़ंिा रहने का, ख़चप है तगड़ा दकसे सुनाऊूँ, जाकर िुखड़ा वबल्ली के छींके के जैस,े दक़तमत कहीं र्े टंगी है ॥ दफर र्ैसों की तंगी है । दफर र्ैसों की तंगी है ॥ जाने िो दिन कब आयेगा धन भी हम र्र हषापयेगा िुविधा िूर, दकए जायेगा मन में, ख़ुशहाली लायेगा कष्ट के आूँसू वजन आूँखों में, तिप्न िहीं सतरं गी है ॥ दफर र्ैसों की तंगी है । दफर र्ैसों की तंगी है ॥

ग़ज़ल हर बशर न जाने क्यों ऐसा, हैरान दिखाई िेता है जैसे हर इंसा में उसको, हैिान दिखाई िेता है ॥ िो लंबी रे स का घोड़ा है, तारीफ़ सुनी वजसकी अकसर िो आज िो क़िम चलने र्र, हलकान दिखाई िेता है ॥ अरमान बहुत हैं, दिल में मगर, चेहरे र्र मातम छाया है, इस नए जमाने का कै सा, इंसान दिखाई िेता है ॥ गॉड र्ार्टपकल ढू ूँढ वलया, इंसान कर रहा है िािा, र्र अर्नी िुवनया से दकतना, अंजान दिखाई िेता है ॥ ये िक़्त ने कै सी करिट ली, बेदफ़क्र घूमते र्शु-र्क्षी और इन्सानों का हुस्न-ए-शहर, िीरान दिखाई िेता है ॥

कविता मैं हूँ सक्षम, तुम हो सक्षम, हम िोनों हैं सक्षम-सक्षम । आओ वमलकर साथ करें हम, ऊजाप स्रोत की रक्षम-रक्षम ।।

ऊजाप स्रोत बहुत सीवमत हैं, ना दफ़जूल बरबाि करें कल दकसने िेखा है ? कहकर, व्यथप में ना प्रवतिाि करें ऊजाप ख़त्म हुई,तो क्या होगा, लम्हा ज़रा िो याि करें कल के ख़ावतर आज बचाएं, ईंधन विकवसत आबाि करें ना भतमासूर की तरह से कोई, करे ऊजाप का भक्षम-भक्षम ।। मैं हूँ सक्षम, तुम हो सक्षम, हम िोनों हैं सक्षम-सक्षम ।। नि दकशोर बच्चों को हमने, बचर्न से समझाना है ऊजाप बचत करें हम कै से ?, खुि करके दिखलाना है र्ेट्रोल, डीज़ल, गैस, कोयला, वबजली र्ानी बचाना है वजससे र्यापिरण बच सके , िो तिभाि अर्नाना है ऊजाप संरक्षण में हो हम, सारे िक्षम-िक्षम-िक्षम ।। मैं हूँ सक्षम, तुम हो सक्षम, हम िोनों हैं सक्षम-सक्षम ।। गैर-र्ारं र्ररक ऊजाप स्रोत, बार-बार हमको हैं र्ुकारें अक्षय ऊजाप से भरे हुए हैं, सूरज, सागर , समीर सारे यदि इनका उर्योग करें तो, ये ही बनेंगे सबके सहारे र्यापिरण भी होगा संतुवलत, यदि उर्योग में इन्हें तिीकारें प्रिूषण से मुक्त धरा हो, यही हमारा लक्षम-लक्षम ।। मैं हूँ सक्षम, तुम हो सक्षम, हम िोनों हैं सक्षम-सक्षम ।।

गीत

हर एक काम, िेश के नाम, हमने मन में ठाना है । आत्मवनभपर भारत ख़ावतर, निविकास को लाना है ॥

कोरट-कोरट कं ठों का बल है,और असंख्य भुजाएूँ हैं इक ही र्ल में घुटने के बल, कई धुरंधर लाएूँ हैं युिा शवक्त के हम हैं मुवखया, र्ंजा कौन लड़ायेगा दकसमें इतनी वहम्मत है जो, हमसे आूँख वमलायेगा विश्व र्टल र्र, आगे बढ़कर, दफर लोहा मनिाना है ॥

हमें वहमालय की चोटी से, िुकमन ने ललकारा है नानी याि दिला िी उनको, ऐसा जमकर मारा है िेश की आन र्े सिा-सिा ही, हमने जीिन िारा है आूँख उठे तो आूँख फोड़ िें, यह सामर्थयप हमारा है काूँर्ें िुकमन, थरथर-थरथर, ऐसा सबक वसखाना है ॥

अथपव्यितथा, को चमकाकर ,अर्नी धाक जमानी है नए-नए उद्योग लगाकर, बे-रोज़गारी हटानी है सिोत्तम सामान बनाकर, हमने हाट बनानी है अर्नी चीज़ों को हमने ही, िुवनया में र्हुंचानी है हर इक क्षेत्र में भारत को ,अब वसरमौर बनाना है ॥

तालाबंिी एक अनूठा अनुभि तालाबंिी इस सिी की सबसे बड़ी त्रासिी है । कोरोना की महामारी से बचने और बचाने के वलए की जानेिाली तालाबंिी एक अनूठा अनुभि साथ लेकर आई है । कई लोगों के वलए यह िैिीय िरिान की तरह प्रकट हुई है तो कई लोगों के वलए यह एक िानिी अवभशार् की तरह कटु अनुभिों को लेकर आई है । अबसे र्हले के िल इवतहास के र्न्नों में कु छ महामाररयों के प्रकोर् की बातें प्राप्त होती थी । लेदकन कभी प्रत्यक्ष रर् से अनुभि करने या कष्ट भोगने का अिसर नहीं वमला था । र्हले भी दकसी एक िेश में या आस-र्ास के प्रान्तों में ही महामाररयों को र्नर्ते और समाप्त होते िेखा गया था । दकन्तु कोरोना ने विश्व के करीब-करीब सभी िेशों को अर्नी चर्ेट में ले वलया है । चीन के िुहान शहर से वनकला यह महारोग दकसी महािानि की तरह मानि समाज को वनगलता चला जा रहा है । विश्व के विकवसत िेशों की तिातर्थय सेिाओं को घुटने टेकने र्र मज़बूर कर रहा है । विश्व के कोने-कोने में त्रावह-त्रावह मची हुई है । मुूँह र्र मातक, साबुन से हाथ धोना, िो गज़ की िूरी, हतत प्रक्षालक का बार-बार उर्योग, संगरोध, ऑवक्सजन िेंरटलेटर, नो हैंड शेक के िल नमतते या नो गले से गले वमलना, चेहरे र्र हाथ न मलना जैसे नए-नए शब्िों से जन मानस का र्ररचय हुआ है । कभी वििेश जाना एक शान और गौरि की बात होती थी लेदकन कोरोना के कारण वििेवशयों से र्ूरा समाज कतराने लगा है और दकसी अछू त की तरह उनसे व्यिहार दकया जाने लगा । र्हले वििेश यात्रा जाने के वलए मन लालावयत रहता था, र्र अब चीन, अमेररका, इंग्लैंड, इटली का हाल िेख कर लोग िहाूँ जाने से कतराने लगे हैं और अर्ना िेश वप्रय लगने लगा है । इस तालबंिी के िौरान मैंने महसूस दकया दक वजन कायों को हम बहुत ही महत्त्िर्ूणप समझते थे या मानते थे , िो शायि उतने महत्त्िर्ूणप नहीं थे । जैसे रुर्ये-र्ैसों को तिातर्थय से ज़्यािा तरजीह िी जाती थी, र्र िातति में तिातर्थय सिोर्रर है, यह बात कोरोना संकट ने एक बार दफर हमें वसखलाया । र्हले हम आलीशान होटलों के खान-र्ान, नए-नए फै शन के र्ररधान, गाड़ी, बंगला, मकान और िुकान को प्राथवमकता िेने में समय व्यतीत कर रहे थे र्र करोना काल में के िल अर्नी ज़ररत की चीज़ों जैसे रोटी-कर्ड़ा और मकान जैसी मूलभूत आिकयकताओं र्र ध्यान िेने की ज़ररत को महसूस कराया । होटल, शॉचर्ंग मॉल, फ़ै शन तट्रीट, वसनेमा हॉल और र्यपटन के तथलों के वबना भी जीिन जीना आ गया । र्हले इन सबके वबना जीिन नीरस लगता था । अब र्ूरा ध्यान अर्नी रोगप्रवतरोधक शवक्त बढ़ाने और र्ौवष्टक आहार प्राप्त करने में लग रहा है । व्यायाम और योग आसान के प्रवत लोगों का ध्यान आकर्षपत हुआ है । आज विज्ञार्न के भ्रमों से वनकल कर सही िततुवतथवत का र्ता चल रहा है । तालाबंिी की िजह से यह बात भी समझ में आई दक कायापलय का काम घर से भी दकया जा सकता है । अगर तकनीकी का सही उर्योग दकया जा सके तो लोगों के यातायात, घर के दकराये, कायापलय तथा कायापलय के र्ररसर र्र होनेिाले ख़चप को आसानी से कम दकया जा सकता है । एक नए युग का सूत्रर्ात हुआ है वजसमें ऑनलाइन बैंककं ग की तरह ऑनलाइन ऑदफस भी दकया जा सकता है । बच्चों को ऑनलाइन लर्निंग सुविधा िेने की तैयारी शुर की गई और काफी मायने में िह सफल भी रही । इससे मानि श्रम )समय और शवक्त( में बचत और ट्रैदफक की िजह से होनेिाले प्रिूषण और यातायात संबंधी समतयाओं से वनजात वमली । लोग घर र्र ही बैठकर ऑदफस के होनेिाले कायों को सरल और सहज रर् में सुविधाजनक तरीके से करने लगे । इससे घर-र्ररिार में भी सुरक्षा का माहौल बना । लोग वबना भाग-िौड़ दकए घर से कायप करने लगे वजससे समय की बचत हुई । भीड़भाड़ िाली जगहों र्र न जाने के कारण असुरवक्षत महसूस करने की भािना से मुवक्त वमली और उससे उर्जनेिाली बेिजह की मानवसक तनािों से भी मुवक्त वमली । आज विश्व की लगभग सभी बड़ी कं र्वनयों ने इसे लागू कर दिया है और इस नई कायपशैली के सकारात्मक र्ररणाम प्राप्त हुए हैं वजससे प्रोत्सावहत होकर इसे और आगे बढ़ाने का वनणपय भी वलया जा रहा है । इस तालबंिी के िौरान मैंने कई कायों को र्ूणप दकया जो समय के अभाि में र्ूणप न कर सका था । चूूँदक तालबंिी के िौरान बाहर कफ़्यूप लगा हुआ था अत: घर र्र ही सुबह से रावत्र तक मेरे र्ास समय ही समय था । कायापलय में भी तालाबंिी होने के कारण के िल िूरभाष के माध्यम या ई-मेल के माध्यम से कायापलय के काम र्ूरे हो जा रहे थे । इस समय का सिुर्योग मैंने अर्नी मनर्संि र्ुततकों को र्ढ़ने में दकया । अर्नी र्ुरानी डायरी की कु छ असंकवलत कविताओं को संकवलत करने का काम

दकया और कु छ अधूरी कविताओं को र्ूरा करने का काम दकया । र्हले जहाूँ बच्चों के सिेरे उठने से र्हले कायापलय के वलए वनकल जाता और िेर रात को थककर घर र्र आने र्र बच्चों को सोता हुआ र्ाता । अर्ने बच्चों को प्यार न िे र्ाने के मलाल को इस तालबंिी के कारण िूर कर सका । अब सुबह से शाम तक बच्चों के साथ समय वबताने लगा तो बच्चे भी अर्ने वर्ता को र्ाकर ख़ुश रहने लगे और रोज़ कहावनयों की फ़रमाइशें करने लगे । मुझे भी कहावनयाूँ सुनाने में आनंि आने लगा । बच्चे भी घुल-वमल गए वजससे घर में सरस िातािरण उत्र्न्न हुआ । रोज़ नई-नई कहावनयों की तरह रोज़ नए-नए र्किान बनाने का कायपक्रम भी चल र्ड़ा । र्त्नी को भी भोजन बनाने में मेरा और बच्चों का साथ वमलने लगा । अब तक उसकी एक वशकायत हमेशा से रही थी दक इनकी )मेरी( तो शािी इनके काम से हुई है । र्र, अब िह वशकायत समाप्त हो गई और घर-र्ररिार को समय िेने के कारण सुखि सावनध्य प्राप्त होने लगा । बच्चों के साथ हम भी बच्चे बनकर साूँर्- सीढ़ी, लूड़ो, अंताक्षरी और न जाने क्या-क्या खेल खेलने लगे । कई नई-नई दफल्मों को होम वथयेटर र्र साथ-साथ िेख आनंदित होने का अिसर वमला । कभी-कभी सोचता हूँ दक अगर तालाबंिी न होती तो शायि घर-आूँगन में यह वमलितपन का िातािरण न प्राप्त होता । तालाबंिी ने जहाूँ इतनी लंबी छु िी िी और िु:ख की इस घड़ी में र्ूरे र्ररिार को एकजुट होकर कोरोना से संघषप करने की प्रेरणा िी । र्ररिार के हर एक सितय की िेखभाल करने की जागृवत मन में प्रिान की । फातट फू ड और जंक फू ड के मायाजाल से वनकालकर बच्चों को तिातर्थयप्रि र्ौवष्टक और सुर्ाच्य भोजन की ओर आकर्षपत कराया और आहार में रोग प्रवतकारक शवक्त के महत्त्ि को अच्छी तरह समझाया । अब तो तिच्छता के र्ाठ को भी बच्चों और बुजग ु ों ने आत्मसात कर वलया है । तालबंिी के कारण मनुष्य के कु छ ऐसे रर् भी उजागर हुए हैं जो मानिता के नाम र्र कलंक हैं । श्रवमकों की समतयाओं को अनिेखा कर ज़बरन तालबंिी की घोषणा की गई वजसके कारण करोड़ों श्रवमक प्रभावित हुए । दिहाड़ी र्र काम करने िाले मज़िूरों को मज़बूर हो अर्ने गृह राज्यों की ओर लौटना र्ड़ा । संसाधनों की कमी और अव्यितथा के चलते लाखों प्रिासी मज़िूरों को र्ररिार के साथ कड़ी धूर् में सैकड़ों मील र्ैिल चलना र्ड़ा और राह की लूटर्ाट, राहजनी जैसी अराजकताओं का वशकार होना र्ड़ा । र्ैसों की कमी के कारण भूख, प्यास और साधन से विहीन सैकड़ों मज़िूरों ने िम तोड़ दिया । सैकड़ों बीमार र्ड़े और अतर्ताल की सुविधा न प्राप्त होने के कारण र्रे शान हुए । बच्चों, बुजुगों और मवहलाओं को सड़क र्र या खुले आसमान के नीचे रातें गुजारनी र्ड़ी । कु छ मज़िूर चलते-चलते थक कर ट्रेन की र्टररयों र्र सोने के वलए वबततर वबछा बैठे और मौत के वशकार हुए । प्रिासी श्रवमकों को विवभन्न राज्यों की राजनीवत का वशकार बनना र्ड़ा और अर्ने गृह राज्य में भी र्रिेवशयोंसा व्यिहार वमला । दकसी के करोना रोगी होने र्र लोग अतर्ताल में उसे छोड़ भाग खड़े हुए और शि का अंवतम संतकार भी भगिान के भरोसे छोड़ दिया । कु छ लोगों ने तो इस मंज़र को िेख आत्महत्या तक की । ऐसा नहीं दक करोना काल में के िल मनुष्य की नकारात्मक िृवत्त ही दिखी बवल्क कई समाज सेवियों और संतथाओं ने आगे बढ़कर मानिता से र्ररर्ूणप कायप भी दकए और मनुष्य की सकारात्मक छवि को र्ेश दकया । श्रवमकों के खाने -र्ीने,रहने और यात्रा की समुवचत व्यितथा की । वििेशों में फूँ से लोगों को िंिे मातरम वमशन के तहत भारत िार्स लाया गया । प्रिासी मज़िूरों को भी वन: शुल्क बस सेिा,श्रवमक तर्ेशल ट्रेन और िायुयानों की विशेष सेिा द्वारा यातायात की व्यितथा की गई । वन: शुल्क लंगरों और वशविरों की व्यितथा की । दफर भी करोना काल का भयािह मंज़र िशकों तक लोग नहीं भूल सकें गे । करोना महामारी ने मनुष्य के सिपश्रेष्ठ होने के अहंकार को चकनाचूर कर दिया है और एक तर्ष्ट संिश े दिया है दक मानि प्रकृ वत के साथ वखलिाड़ करना बंि करें अन्यथा प्रकृ वत का प्रकोर् मानि िंश को समूल नष्ट कर िेगा । मनुष्य को इस धरती र्र वजयो और जीने िो के वसद्ान्त र्र चल कर अर्ना जीिन जीना चावहए और सभी जीि-जंतुओं का ख़्याल रखना चावहए तादक प्रकृ वत का संतल ु न बना रहे ।

झठ ू का पु लं दा “क पल जी ! आप कहाँ हो ?” मने कहा , “ सर, आज ह

द ल से लौट रहा हँू | अभी े न से उतरा हँू | बस अपने घर पहँु च रहा हँू | बो लए, कछ काम था ?” ु “म कल से ह आपको फोन कर रहा था | आपसे बहत ु ज़ र काम था | बस घर पहँु चते ह मझे ु बताना |” मने सोचा ऐसा या काम हो सकता है जो सर मझे ु कल से फोन कर रहे ह | िज ह म सर का संबोधन दे रहा हँू , उनका नाम है शंग ृ ाल सं ह | कसी शंृगाल ( सयार) क तरह चतरु और हो शयार | वे मेरे आ फस म मझ ु से तीन दज़ा ऊपर क पो ट पर ह या न वो िजस जगह पर आज ह, उस जगह तक पहँु चने म मझे ु कर ब 13 वष लग जाएँगे | वे मेरा बेसबर से इंतज़ार कर रहे थे | उ ह ने कई बार फोन

कया और हर पं ह मनट बाद बराबर जायज़ा लेते रहे | मझे ु लगा कोई अरजट काम

होगा; अ यथा, सर मझे ु इस कदर फोन नह ं करते |

घर पहँुचने के बाद मने उ ह बताया क म घर आ चका हँू | ु उ ह ने घर का पता पछा और कहा, “म उसी रा ते पर आ रहा हँू |” ू मने कहा, “म आपके पास आ जाता हँू | आप हनमान मं दर के पास आ ु

जाइये जो रा ते म ह पड़ता है | म बस पहँु च रहा हँू |” मं दर के पहले ह वे मझे मल गए और कहने लगे, “क पल ! बड़ी मिु कल ु म हँू | मझे ु पचास हज़ार |

पये क स त ज़ रत है | म दो दन बाद आपको दे दँ ग ू ा

मने कहा, “ पचास हज़ार तो मेरे पास नह ं ह | आप कह तो चेक दे दँ ू |” वो बोले, “चेक मत दो | कैश चा हए |”

मने कहा, “बक के एट एम से केवल चाल स हज़ार ह

नकाल सकते ह |”

उ ह ने कहा, “ठ क है | मझे ु चाल स हज़ार ह दे दो | म पेमट आते ह दे दँ ग ू ा |”

मने एट एम से पैसे नकाले और उ ह दे दये | पैसे लेते समय उनक आँख म राहत दखाई द जो कसी बड़े बोझ के सर से उतर जाने पर होती है | उनक आँख म कत ता साफ झलक रह थी | ृ

वेतन का दन आया और चला गया | म भी अपनी य तताओं म रहा, पर

जब दस दन से

यादा होने लगा और घर का बजट गड़बड़ाने लगा तो फर मने

फोन पर हाल पछना और याद दलाना चाहा क मझे ू ु मेरे पैसे वापस चा हए | पर

उनका फोन नह ं लगा रहा था | शायद नेटवक लग नह ं रहा था या फोन को उ ह ने बंद कर रखा था |

ख़ैर, एक दन वो आ फस म मले तो मने याद दलाया तो उ ह ने कहा, “आज ह आया हँू | या बताऊँ ? मेरे पीछे विजले स क ट म लगी है | मझे ु परे शान कर रह है | मेरे फोन भी रे कॉड कए जा रहे ह | आप का काम म कर दँ ग ू ा | बस मझे दन और दे दो | इस मह ने क आ खर तक आपको आपके पैसे दे ु कछ ु दँ ग ू ा |”

इसके बाद वो नह ं मले | कछ तो उनका आ फस न आना और आना तो मझसे न ु ु मलना | मने भी सोचा क मह ने के आ खर तक क मोहलत तो दे नी होगी | परा ू

मह ना बीत गया फर भी इन स जन ने न तो फोन कया, न ह

मलने क

त परता दखाई | अब मझे ु उनक नीयत ठ क नह ं लगी | मने उनको फोन करना शु

कर

दया तो उ ह ने फोन उठाना ह बंद कर दया | चार बार फोन करने पर उनका एक मेसेज आ जाता क म अभी बज़ी हँू , बाद म फोन क ँ गा | या फर अभी म बाहर हँू , वापस आने के बाद आपसे मलंूगा | अब मेर हालत ऐसी हो गई क हर एक काम म इन पैस क तंगी दखाई

दे ने लगी | मेरे ह पैस पर कोई और यि त आनंद ले रहा है और म उसके पीछे बेबस होकर माँग कर रहा हँू क वो कसी भी तरह मेरे पैसे वापस कर दे जब क उसे मेरा अहसान मानना चा हए था और मझे ु ईमानदार के साथ बना बोले द गई रकम वापस कर दे नी चा हए थी |

कर ब दो मह ने तक लका ु छपी का खेल चलता रहा | मेरे स

का बांध टट ू

चका था | मने अपने व र ठ अफसर से ये बात साझा क | उसने अपना सर पीट ु

लया | बोला, “अरे ! उसने तमसे भी पैसे लए | वो बहत ाड आदमी है | बहत ु ु ह ु ह कमीना और मतलबी | आप उसके झांसे म आ गए | मझे ु तु ह पहले ह बताना चा हए था | इस ब दे ने मेरे से भी प चीस हज़ार लए | तु ह म वो सारे फोन

का स और मेसेज दखाता हँू |” उ ह ने मझे ु कर ब एक मह ने तक के मेसेज दखाये और कहा, “दे खो कैसे

इसने क नी काट | वो तो दे ने के मड ू म ह नह ं था पर मने उसक नींद हराम कर

द तब जाकर उसने मझे ु मेरे पैसे वापस कए | वो भी मझे ु लगता है कसी और को

टोपी पहना कर मझे दये ह गे | तम ु ु भी मेर एक बात मानो | इसके पीछे पड़ जाओ | कसी भी तरह अपने पैसे ले लो नह ं तो सना ु है क ये इस आ फस से भी भागना चाहता है | लगता है इसने कई लोग से पैसे लए ह और सबको ग चा दे कर चपक ु े से अपनी

ा सफर करवाना चाहता है |”

मने पछा ू , “मझे ु कह रहा था क इसके पीछे विजलस लगी है |”

उ होने कहा, “ सना पैस का झोल कया है ु तो मने भी यह है क इसने कछ ु

िजसक वजह से इसके बक अकाउं ट को सील कर दया गया है | बाक इसके पीछे क

या

टोर है , गॉड नोज़ |”

अब मने मन म ठान लया क जब तक मेरे परेू पैसे नह ं मलगे तब तक न

म चैन से बैठू ँ गा न उनको चैन से बैठने दँ ग ू ा | वैसे भी प नी को इस बात का पता

चल जाये तो घर म हंगामा हो जायेगा | कहगी क यहाँ हमको एक-एक पैसा बचाने के लए कहते ह और अपना दानवीर कण बनते फरते ह | मने सबह से फोन करना शु ु

फर मने मेसेज़ करना शु

करना कया तो साहब ने जवाब ह नह ं दया |

कर दया क मझे ु मेरे पैसे चा हए | आपने वादा कया

था | साथ ह बड़ी वन ता से pl॰(please) जैसा श द भी लगा दे ता था क शायद मेरा काम बन जाये परं तु नराशा हाथ लगी | उ ह ने मेरे मेसेज़ का कोई जवाब नह ं दया | जैसे कसी क अज़ को आगे क तार ख तक लं बत कर दया जाता है ठ क

उसी तरह उ ह ने मेरे pl. जैसे श द को wl.(waiting list) म बदल दया | मेरे समझ म आ चका था क ये भाई साहब बहत ु ु ह उ ताद ह | अब थोड़ी उ ताद इनसे भी करनी पड़ेगी वना पैसे नह ं मलगे | अब म वक प को ढँू ढने लगा | सोचा

या रा ता अि तयार क ँ ?

या पोल स ठाणे म जाकर रपट लखवाऊँ या

फर पकड़कर दो- चार हाथ आजमाऊँ | पर दोन से नराशा ह हाथ लगाने क गंज ु ाइश थी

य क पैसे दे ते व त कोई लखा-पढ़ नह ं हई भी ु ु थी सो वह मकर सकता है | साथ ह साथ धमक या मार-पीट करने पर मेरे खलाफ केस बन सकता है और पैसे भी हाथ से जाते | सो मने उनको घर पर पकड़ने क को शश क | सोचा पहले घर का पता लगा कर आते ह | नह ं तो पता चला क घर भी कराये पर लया हो तो फर 40,000/- क चपत लगनी ह है | इस बीच सोचा पहले जाँच लँ ू क ऑ फस म ह या नह ं | य द ऑ फस म

मल गए तो इस वषय का समाधान कर लँ ू | सो फोन पर लडलाइन से बात क तो

उ ह ने फोन उठाया और च के | फर मझसे पछा क आप कहाँ हो ? मने कहा म ु ू अपने ऑ फस म हँू तो उ ह ने कहा बस म पाँच मनट म पहँु च रहा हँू | पाँच का पचास मनट हो गया पर वो नह ं पहँु च | फोन करने पर एक मेसेज आ जाता क

इस समय म एक मी टंग म हँू | म आपको फोन क ँ गा | अब मने भी इनको तंग करने क ठानी | हर आधे घंटे बाद एक फोन या मेसेज डालना शु कर दया पर कोई जवाब नह ं आया | दोपहर दो बजे इ ह ने फोन उठाया और कहा क आपके

काम से ह जा रहा हँू | आज आपके अकाउं ट म पैसे डलवा दे ता हँू | मने अपने दो त को कहा है क वो मेरे अकाउं ट म पैसे न डालकर आपके अकाउं ट म पैसे डाल दे | आपको आज ह पैसे मल जाएँगे | एक काम करो, आपका बक अकाउं ट नंबर एसएमएस कर दो |

मने अपना बक अकाउं ट नंबर एसएमएस कर दया | रात तक कोई भी पैसा खाते म नह ं आया | तो सबह मने फर परे शान होकर फोन करना शु ु

कर दया क

पैसे नह ं पहँु चे तो उ ह ने कहा, “सबह यारह बजे तक ांसफर हो जाएगा | फर एक ु बजे तक, फर तीन बजे तक, फर चार बजे तक , यहाँ तक के पाँच बजे तक | फर उ ह ने कहा क दो त ने धोखा दे दया | पैसे नह ं भजवाये | म अभी वाशी म हँू | अपने लड़के को इसी काम के लए लगाया है, वो शाम 6 बजे तक, यादा से यादा 7.30 बजे तक प का काम कर दे गा | आप नाराज़ मत होना | म बहत ु ह खराब महसस ू कर रहा हँू क आपको बार-बार फोन करना पड़ रहा है | अब शाम को मने उनके घर पर डेरा डाला | उनक

बि डंग क सर ु ा के

लए तैनात लोग से मने उनका बायो-डाटा नकलवाया तो पता चला क अभी हाल ह म वो नोयडा से आये

ह | प त-प नी के साथ एक doggy बस इतने ह लोग

रहते ह | उनक प नी से बात नह ं हो पाई

य क इंटरकॉम पर बेल बज रह थी पर

कोई उठा नह ं रहा था | या न यह यि त घर पर तो नह ं है , इतना प का था | पछा घर तो उनका खद ू ु का है या नह ं तो सरु ा कमचार ने बताया क उनका अपना खद ु का घर है |

रात आठ बजे एक बार फर च कर लगाया तो पता चला क मैडम घर पर ह

| उ ह ने फोन उठाया और कहा क साहब तो अभी घर पर नह ं आये | आप कौन बोल रहे ह ? मने कहा म उनके ऑ फस म काम करनेवाला एक यि त बोल रहा हँू तो उ ह ने कहा भाईसाहब! आप घर पर आ जाईए | अभी आते ह ह गे |” मने कहा, “म गेट के बाहर ह हँू | म यह ं इंतज़ार करता हँू |”

कछ समय बाद उनका फोन इंटरकाम पर आया और उ ह ने मझसे कहा है ु ु

क म आपसे मलने अभी नीचे आ रहा हँू | बि डंग से नीचे आने के बाद बाहर अपना दखड़ा रोने लगे | बोले, “आपके काम के लए म कां दवल गया था | वह ं से ु

गाड़ी चलाकर अभी-अभी आया हँू |” मने मन म सोचा म बेवकफ होऊँगा जो तु हार ू बात पर यक न कर लँ ूगा | मने तरंु त कहा, “सच म आपको मेरे लए बहत ु दरू तक जाना पड़ा पर

या मेरा काम हो गया ?” उसने कहा क मेरे दो त के पास एट एम

काड नह ं है | वह कल सबह बक म जाएगा और आपके दये गए अकाउं ट म पैसे ु ा सफर कर दे गा | अब आपको 49,500

“मझे ु मेरे पैसे मल जाएँ

यह भी बता दया क चेक

य क ब ची के

पये मल जाएँगे | ठ क है ?” मने कहा, लासेस क फ स जमा करनी है | साथ ह

ल यर न होने पर वो मेरा नाम लैक ल ट म डाल दे ने

क धमक दे रहे ह और पेना ट अलग से लगाएंगे | इसी लए म बार –बार आपको फोन कर रहा था और घर पर आया था | आप मेर तकल फ को सम झए |” उ ह ने कहा, “म समझता हँू | पर या बताऊँ शायद म इतनी छोट रकम के लए तु ह परे शान न करता | मेरे दोन खात को विजले सवाले ने सील कर रखा है | अपश द

का इ तेमाल करते हए ु उ ह ने अपनी भड़ास नकाल क मेरा नोएडा म क ट मनल का एक बिजनेस ह िजसके तीन पाटनर थे पर तीसरा पाटनर थोड़ा बदमाश था और ौड भी | सो हमने उससे कहा क आप अपना ह सा लेकर अलग हो जाओ | हम आपके साथ पाटनर शप म बज़नस नह ं करना है | 9 करोड़ के पाटनर शप म उसके 2 करोड़ 40 लाख

पये थे | हमने उसके पैसे वापस कर दये | इस बात पर नाराज़

होकर उसने हम पर आरोप लगाया क हमने उसे पे ोल प प दलाने का वादा कया था और उसके एवज म हमने उससे 2 करोड़

पये क

र वत ल | अपने रसख ू का

इ तेमाल करते हए शकायत कर द और हम फंसा ू ु स ल विजले स ऑ फस म झठ दया | वहाँ के एक बड़े अफसर से साँठ-गाँठ कर मेरे खलाफ केस बना दया | अब विजले स ऑ फस ने मेरे दो खात के लेन-दे न पर रोक लगा द है | मने भी एक गलती क

क इसक जानकार अपने ऑ फस को नह ं द | मझे ु अपने आईपीआर म

इसे शो करना था पर मने इसे नह ं कया | अब मझे ु बार-बार नोएडा जाना पड़ रहा है | मने विजले स ऑ फसर को ि लयर कया क मेरा पे ोल प प का कोई

बिजनेस नह ं है और हमने उस बंदे को उसका परा ू पैसे चेक के ज रए वापस कर दया है और

माण के तौर पर बक अकाउं ट क

टे टमट भी दखाई क उसके खाते

म पैसे पहँु च गए ह | विजले स वाले ने इस बात को मान ल है और मेरा अकाउं ट कर दे ने के लए कहा है | फर उ ह ने लंबी साँस लेते हए ु कहा क आपका पैसा दे ना मेर first priority है |” मने कहा, “दे खो

लासेस वाल ने पेना ट के तौर पर 500

पये लगा दये ह

|” तो उ ह ने कहा, “म वो सब आपको दँ ग ू ा | जो भी पेना ट या याज है | इन सब का भगतान म क ँ गा | कल आपका वेतन आ जाएगा | उससे ु

लासेस वाल का

पैसा दे दो | मेरा पैसा आते ह सब ठ क हो जाएगा | Don’t worry॰” नराश होकर घर पर आया तो घर पर उसका जो गु सा फट ू पड़ा वो बताने

लायक नह ं है और शायद लखने लायक भी नह ं है | मने महसस कया क ये ू आदमी है या झूठ का पु लं दा |

ऑ फस म मलने क बात कहकर भाग जाता है | फोन को तो अ वल उठाता

ह नह ं और उठाता है तो कहता है क आपके काम से वाशी आया हँू | अपने लड़के को आपके काम पर लगाया है | (जब क लड़का अमे रका म रहता है ) आज कां दवल गया था | दो त धोखेबाज़ नकला | आपके अकाउं ट म

यादा रकम डाल

दँ ग पर कहता है क हाँ मल गए ह | फर कहता है क कल ू ा | पैसे मल गए पछने ू आपके अकाउं ट म डाल दँ ग ू ा | फर कहता है अभी म बाहर हँू | आपके पैस का बंदोब त हो गया है | सबह ऑ फस म आपको दे दँ ग ु ू ा | फर कहता है मेरे दो त के

पास एट एम काड नह ं है, वो कल बक से पैसे नकाल कर दे गा | या न झठ ू ... वो भी सफ़ेद झठ ू | साथ ह साथ झठ ू पर झठ ू |

दो-चार दन बाद मने फर से फरमाइश शु

कर द तो जनाब बोले क म

अपना पे-एडवांस नकाल रहा हँू दो लाख का और उ ह ने अज़ भी दखाई | कहा इस विजले स वाले ने मेरा जीना हराम कर रखा है | अभी भी मेरा पेमट नह ं मला है | मने ऊपर अपनी बात पहँु चाई है और सीधे ईडी के द तर से ल यर करवाया है | यहाँ के फ़ना स वाले कांपते ह | कोई नणय नह ं ले सकते | मेरा पैसा आते ह आपको दे दँ ग क मझे ू ा | मने अपना दख ु ड़ा सनाया ु ु पैस क स त ज़ रत है | आप कहते हो क आपका पेमट आ गया है , उससे 46,000 हज़ार वाल फ स भर दो | इस बार मेरा नेट पेमट आया है 65,000 के कर ब | अब इसम से 46,000 के दये तो 19,000 म घर का खच कैसे चलेगा | उसम भी 12,500

लासेस

पये क घर

क एक ईएमआई कट जाती है | उलटा मझे कसी और से खच माँगना पड़ेगा | ु उ ह ने द रया दल

दखाते हए एक लाख पये ले लेना ु ु कहा मेरे पैसे आते ह मझसे | जब तु हारे पास हो जाएँगे तब दे दे ना | म उनका मँुह दे खता रह गया | ये आदमी फ र ता है या शैतान | मेरे लए हए ु 40,000 को तीन मह ने से अब तक नह ं दया है और अब कह रहा है 1 लाख मझसे ले लेना | बाद म अपनी सहू लयत के हसाब ु

से क त म वापस कर दे ना | मने भी अनकल ु ू मौके को दे खकर कहा सचमच ु मझे ु पैस क स त ज़ रत है | ल ज ज़ र कर दे ना | उ ह ने कहा क अब म खद ु

तु हारे घर आकर पैसे दे जाऊँगा | आपको बार-बार बोलने क ज़ रत नह ं होगी |

कछ दन बाद मने फ़ना स से पता कया तो उ ह ने बताया क हाँ उसक दो ु

लाख वाल बात सच है | अगले दो दन म ऑफ साइकल रन होना है | उसका पेमट हो जाएगा | दो दन बाद पेमट हो गया ले कन फर भी मझे ु मेरे पैसे न मले तो

मने फोन पर शकायत क | उ ह ने कहा म आपके काम के लए ह अभी बक म ह बैठा हँू | मझे ु चेक से पेमट नह ं मल सकता और withdrawal ि लप से विजले स के कारण नह ं नकाल सकता | हाँ, एट एम काड को लॉक नह ं कया है | जैसे ह उसका एट एम काड का पन आ जाएगा वैसे ह बक म जाकर नकाल कर दे दँू गा | अब तो समझो आप का काम हो ह गया |

अ छा , अब इ ह ने एक-दो दन कराते-कराते एक स ताह तक चहे ू - ब ल का

खेल करते रहे | मझे ु समझ नह ं आ रहा था क एट एम काड जो इ ह ने दखाया वो पराना लगा रहा था | उसक वै यता(expiry) भी वष 2018 क ु

दखा रहा था | मझे ु

अपने एट एम काड क याद आई जो उसी बक का था और पछले चार-पाँच मह ने

पहले जब मेरा एट एम काड गम ु हो गया था | तब जो बक ने मझे ु नया एट एम काड महै ु या करवाया था उसका वष 2038 तक का expiry वष था |

फर भी मने िजरह नह ं क और कहा अब कब आऊँ ? उ ह ने कहा क अब

एट एम काड कू रयर से आयेगा | जैसे आयेगा, वैसे बक म जाऊँगा | अब तो मेरे

हाथ म होगा | खट से एट एम काड से पैसे नकाल लँू गा, कोई बक म चेक थोड़ी दे ना

है | फट से पैसे नकाल कर आपके चरण म रख दं ग ू ा | इशारा ऐसा क धन-ल मी, सबसे पहले आपके चरण म सम पत |

दो दन बाद भी जब पैस का सभीता न हआ तो फर उनके पास शकायत ु ु क तो बड़े ह अंदाज़ म कहा क मने पता कया है क एट एम पन अहमदाबाद से नकल चका है | आज शाम तक आ जाएगा | ु शाम तक

या दसरे दन भी जब मझे ू ु फोन नह ं आया तो मेरा पारा चढ़ने

लगा | लगा क इस आदमी को सरे -आम गोल मार दे ना चा हए | अपने मेहनत से कमाए पैसे के लए इतनी वन ता के साथ बात पछले तीन मह ने से बात कर रहा हँू और यह नल ज क तरह टालमटोल करता जा रहा है | दसरे दन ऑ फस म मला तो बोला आज ह ठाणे जा रहा हँू | आज कैसे भी ू पन लेकर आ जाता हँू और तु हारे घर पैसे दे कर जाऊँगा | शाम को मझे ु लगा क एक बार जाकर दे खना चा हए क ये सचमच ु पैसे दे गा

या घर पर बैठकर बहानेबाजी करता रहे गा | म उनक

बि डंग म गया और नीचे खड़े

सरु ा कमचार को बताया क म साहब से मलना चाहता हँू | उसने इंटर कॉम पर मैडम से बात क तो उ ह ने बताया क साहब तो घर पर नह ं ह | मने मैडम से बात करते हआ कहा क मझे ु आपसे ज र बात करनी है | मैडम ने घर पर आने के ु लए कहा | घर जाकर मने सार कहानी बताई तो उ ह ने अपना माथा पीट लया | उ ह ने कहा ये तो बहत ू बोलते ह | िजसके चलते कई बार िज़ लत सहनी पड़ती ु झठ है | पछल बार जब आप से बात हई ु थी, उसी दन आपने बता दया होता तो आपका पैसा वापस करवा दे ती | उस दन ह बक से डेढ़ लाख पये नकाले | दो लेनदार म से एक को एक लाख

पये और दसरे को पचास हज़ार ू

पये दये |

अब म समझ चका था क इ ह ने मझसे झठ ु ु ू बोला है | पैसे तो इ ह ने सारे

खच कर दये ह अब बहानेबाजी का दौर चल रहा है | कसी तरह टालते जाओ और कसी तरह दन नकालो | मने उनक

ीमती जी से पछा क ऐसा ू

य कर रह ह ?

तो उ ह ने बताया क पु तैनी ज़मीन है नोएडा म | वहां पर ज़मीन के दाम आसमान छू रहे ह | इ ह ने अपनी करोड़ क जमीन को बेचने के लए पाटनर शप म काम शु

कया | इनके बड़े भाई का लड़का इसम शा मल हो गया | म मना कर रह थी,

पर ये नह ं माना | बोला भाई का लड़का है | भाई का लड़का बड़ा ह चालू नकला | उसने सबसे पैसे ले लए और ज़मीन कसी के भी नाम नह ं कर | तो सबने अपनेअपने पैसे माँगे | पैसे तो उसने खच कर दये | रोज़-रोज़ नई गा डयाँ आ रह ं ह | रोज़-रोज़ दावत हो रह ह | ज़मीन तो उनक थी नह ं | ज़मीन हमार थी और ये लोग राजा बने बैठे फर रहे थे | कसी से दस लाख, कसी से बीस लाख लए | अब िजसका पैसा गया है, वो तो मांगेगा ह | लोग ने कोट म केस कर दया तो पु लस जो नौकर म है उसे ह पकड़ेगी | बाक लोग के पास कछ ढं ग का हो तो पकड़े | ु

मने भी कह दया क ज़मीन के हम पैसे मले ह नह ं | फर कागजात कहाँ ह क हमने ज़मीन बेची है ? पु लस ने जेठ के लड़के को जेल म डाल दया | मने जज से कहा क हमार

ज़मीन बेचने का हक उ ह कैसे है ? उनको बेचना था तो अपनी ज़मीन बेचते | जब हमने ज़मीन बेची ह नह ं है और न ह हमने पैसे लए तो हमारे ऊपर केस कैसे बनता है ? जज ने बात मान ल और जेठ के लड़के को तब तक जेल म रखने के लए कहा है जब तक सभी क रकम अदा नह ं हो जाती | अब ये मझसे नाराज़ रहते ु

ह क मेरे भतीजे को जेल करवा द | मेरे सगे भाई से मेरा र ता खराब करवा दया

| मने कहा जो गलत काम करे गा, वो भगते ु गा भी | 6 करोड़ क ज़मीन क क मत | ऐसे ह इनको हवा म गु बारे क तरह फला कर रख रह थी | ज़मीन पर पाँव भी ु

नह ं पड़ते थे | अब हवा नकल तो खाने के लए पैसे भी नह ं | तीन मह ने से घर क हालत खराब है पर ये छै ला बनकर घम ू रहा है | इतने म इनका फोन आया तो मने

पीकर पर लगा दया | इ ह ने बहाना

करते हए ु समझा रहे थे क बक म एट एम पन के दो बोरे भरे थे | मने एक ु मझे को चाय-पानी का 100 पया भी दया | वो बेचारा बहत ु ढँू ढ़ा पर नह ं मला | कल एट एम का नया पन बनाकर दे गा | अब उ ह ने फोन पर ह झाड़ना शु दो | इनक लड़क के

ीमतीजी को बहत ु गु सा आया और कर दया क झठ ू मत बोलो | इनका पैसा वापस कर

लासेस क फ स जमा करानी है | कल का कल पैसा वापस

करो | इ ह ने फोन काट दया |

ीमतीजी ने कहा आप मझे ु दो दन का व त

द िजए | म आपके परेू पैसे इनसे दलवाऊंगी | बस र ववार तक

क जाईए |

म इनके घर से नकल ह रहा था क दे खा साहब आ गए ह | मझे ु अपने घर

पर दे ख चकराये |

ीमतीजी क फटकार शु

हो गई |

य सामनेवाले को परे शान

करते हो ? इनका पैसा इंतज़ाम करके दे दो | साहब बोले, “ अरे ! इसी के लए तो ठाणे म गया था | दो बोरे पन से भरे थे | कोई आसान काम है पन को ढँू ढ़ना | वो तो मने बहत ु को शश कर | एक आदमी को भी साथ ढंू ढवाया फर भी नह ं मला कहते हए के ु ु अपने डो गी को घमाने लए बाहर नकल पड़े | फर बाहर आकर मझसे कहा, “ भाड़ म जाए एट एम और ु

उसका पन | म आपको कल के कल दोपहर तक पैसे दे दँ ग ू ा |”

मझे व वास नह ं हआ | मने कहा, “स ची ! आप पर अब मझे व वास नह ं ु ु ु रहा | ॉ मस करते हो ?” उ ह ने कहा , “ प का ॉ मस | अब आपको च कर नह ं लगाना पड़ेगा |” दसरे दन ऑ फस म मले तो बोले , “आज सानपाडा म बक के ऑ फस म ू

जा रहा हँू | नया पन

एट कराने के लए |”

मने भी अनजान बनाकर कहा, “ठ क है | शाम तक दे दो |” मझे ु पता था क

शाम को

या बहाना आएगा | सो मने फोन नह ं कया | शाम को इनका ह फोन

आया और इ ह ने मझसे कहा क म एट एम का पन ु

एट करवा लया है | पर

उसका एि टवेशन कल बकवाला सबह 11 बजे करे गा |” ु

मने कहा, “ ठ क है | ऑ फस म आपसे पैसे ले लेता हँू |” उ ह ने कहा, “ कल तो श नवार है | ऑ फस बंद है |” मने कहा , “ ठ क है घर पर आकर ले लेता हँू |” उ ह ने कहा, “ मझे काम है | बाहर जाना पड़ेगा |” ु बारह बजे कछ ु

मझे ु तो पता था क कोई एि टवेशन वगैरह नह ं होने वाला | कभी एट एम

पन को कोई एि टवेट करता है | वो तो कोि फड टयल नंबर होता है जो बक कभी खोल कर नह ं दे खता | बस उसके साथ आपके एट एम काड से पन उप हो जाने पर आप कह ं पर भी एट एम काड का उपयोग कर सकते ह | इतनी छोट -सी बात सभी जानते है क एट एम का पन बक कभी शेयर नह ं करता और स त हदायत दे ता है क ये नंबर कसी भी बक कमचार या अ धकार से शेयर न कया जाय | ख़ैर | आशा पर सारा संसार टका है | सोचा श नवार क सबह शायद इंतज़ाम ु

कर लया हो | सबह 10.48 पर इनके घर पहँु चा तो पता चला ये गायब | घर पर ु नह ं ह | चार-पाँच बार फोन करने पर भी जवाब नह ं दया | तो मेरा शक सह रहा क ये पहले ह राह मझे मल ु

नकल लगे तो घर पर आदमी परे शान होकर चला जाएगा | अब एक क चलो इनक प नी से ह बोलकर पैस का इंतज़ाम कर

य क ये

तो अब आने से रहा | उनक प नी ने दरवाजा खोला और कहा, “भैया ! मने आपको र ववार को आने के लए कहा था ले कन आप आज आ गए |” मने कहा, “ मैडम, साहब ने मझसे आज सबह का ु ु

ॉ मस कया था | फर

मझे ु सामनेवाले को पैसे दे ने ह नह ं तो आज म नह ं आता |”

अब मैडम को बहत ु गु सा आया और वह ं से मोबाइल पर लताड़ते हए ु कहा, “ जब तु हारे पास पैसे नह ं ह तो सामनेवाले को टाइम य दे ते हो ? वो अपना काम –काज छोड़कर सफ तु हारे पास पैसे के लए आएगा और तम ु घम ू रहे हो ? सामने वाले क कोई इ ज़त नह ं है या नह ं ? वो अपना सब कछ छोड़ कर सफ तु हारे ु

भरोसे यहाँ आया हआ है | उसक लड़क क पढ़ाई के लए परे शान हो रहा है | ु तमको शम नह ं आती है | ऐसे आदमी को बना वजह परे शान कर रहे हो ...” साहब ु ने फोन काट दया |

मैडम का गु सा अभी भी उतरा नह ं था | तभी उनक लड़क का फोन आया

और बात होने लगी क इस आदमी को तू तो जानती ह है क इसने तेर पढ़ाई के समय भी कहा था क पैसे नह ं ह | तेर पढ़ाई के लए पैसा भी नह ं दया | मने

कैसे-कैसे तेर पढ़ाई परू करवाई | अब कसी और क लड़क क पढ़ाई के लए

उसका बाप मारा-मारा फर रहा है | ये ...... बड़ा बड़कई लटने लगता है | कल आ ू

जाना | अरे जब तेरे पास पैसे ह तब बोलता तो ठ क था | अब फोन पर जवाब तक नह ं दे ता | आदमी अब घर का च कर नह ं मारे गा तो

या करे गा ? छोड़, जाने दे |

ये कभी नह ं सधरगे | म तेरे पटे ल अंकल से बात करती हँू | वो मेरे बात नह ं काटगे ु | तीन-चार दन बाद पैसे दे ने के वादे पर पैस का बंध हो जाएगा | तू चं ता मत कर |”

मझे नह ं हँू | इनक वजह से परा ु लगा क सफ़ म ह दखी ु ू प रवार भी दखी ु है और शायद ये भी चैन से नह ं होगा | मने दख ु जा हर करते हए ु कहा, “ मेर वजह से ऐसा माहौल बना | शायद म घर पर नह ं आता पर बार-बार मझे ु भी पैस के लए फोन आते ह और जवाब दे ने पड़ते ह | सामनेवाले को कब तक आशा दलाता रहँू गा |” मैडम ने कहा, “ वैसे मने कसी से कहा है | अगर आज शाम तक पैसे आ जाते है तो शाम को ह नह ं तो कल म आपको पैसे दलवा दँ ग ू ी | sorry, आपको तकल फ हो रह है |”

मझे ु कहना पड़ा क sorry तो म आपसे कहना चाहता हँू से आपके परेू प रवार को क ट दे रहा हँू | उस दे वी क स चाई म मझे ु एक स चे

य क इनक वजह

काश क झलक दखाई द | जो

तेज़ उसक बात म था, वो साहब कभी नह ं पा सकते | नमन करने का मन कया क एक संवेदनशील

दय है जो स चे दल से अपने प त क करतत ू पर फटकार

लगाती है और दसरे को दलासा दे ने के साथ ह काम पर ज़ोर दे ती है , उसक ू

िज मेदार भी उठाती है | न क झठ ू बोलकर अपने प त क करतत ू पर पदा डाले या प त को बचाने क को शश करे |

वहाँ से नकलने के बाद मन म आया साले को पकड़कर दो तमाचे लगाऊँ | बाद म जो भी होगा दे खा जाएगा | पैसे नह ं मलगे और

या होगा ? ऐसे भी उसने

अब तक कहाँ पैसे दये ? साहब के होश ठकाने आ जाएँगे | कसी और के साथ धोखाधड़ी करते समय याद आ जाये क कसी ने ईट का जवाब प थर से दया था | ले कन न जाने

य मेरे सं कार आड़े आ जाते ह और म अपश द का इ तेमाल भी

नह ं कर पाता | सड़क पर उसे जल ल कया जा सकता है ले कन म नह ं करता | ऊँची आवाज़ म या गु से से फटकर भड़ास नकाल जा सकती है ले कन नह ं कर ू पाता | म य थत ह रह जाता हँू | काश म अपने मन-मि त क को वेदने वाले तफान को बाहर नकल पाता और शांत हो जाता | शायद मझे ू ु मेरे स जनता का मझे ु बहु त बड़ा दं ड मला है |

र ववार आया भी और चला भी गया | मने सोचा जब इनका तो ये फोन करगे तब ह जाकर पता क ँ गा | यथ म घर जाकर अपमा नत करवाना और उनक

ीमतीजी को मान सक क ट दे ना |

बंध हो जाएगा य खद ु को

र ववार को साहब ने फोन कया और नया क सा सन ु ाया क बक के चार –

चार लोग एट एम का पन

ै क करने क को शश करते रहे पर पन

ै क नह ं हो

पाया | मेर मैडम (प नी) ने मझे ु शाम तक तु ह पैसे दे ने के लए कहा था | उ ह ने कसी से पैसे मँगवाए ह वो बंदा दोपहर तीन बजे घर पर आकर पैसे दे जाएगा |

आप शाम चार या साढ़े चार बजे आकर अपना पैसा ले जाओ |” मने सोचा

या बहानेबाजी है पैसे तो कसी और से लेकर दे ने ह | बहाना है

एट एम काड के पन का नह ं चलना या

ै क करने का | आदमी

प ट

प से अपनी

कमज़ोर नह ं बता रहा है क मेरे पास पैसे नह ं ह | म कसी और से लेकर दे ता हँू | ले कन ऊँची-ऊँची फक रहा है | मने भी चपचाप बना बताए उनक र ल लपेटनी शु ु कर द | ठ क है कल शाम को आ जाऊँगा |

सोमवार को शाम पौने छ बजे उनके घर गया तो उ ह ने से फ के नाम का चेक दया और वह भी तीन दन बाद का | बोले तीन दन बाद बक से भजा लेना | मने भी दन गने तो पता चला क इस रकम को दये हए ु 84 दन हो गए ह | य द चेक ि लयर हो गया तो समझंूगा क 84 लाख यो नय से मिु त मल गई या न नवाण

ा त हो गया और य द चेक ि लयर न हआ या बाऊ स हो गया तो ु समझंूगा 99 का दखद च फर से शु हो गया | ु

तीन दन बाद भी वह ढ़ाक के तीन पात वाला क सा हआ या न वह कहानी ु दहराई गई िजससे मझे फर से पैसे न मल | इस बार उ ह ने गु वार क सबह ह ु ु ु फोन कर दया और कहा क चेक बक म अभी मत डालना | अभी पैसे

ांसफर नह ं

हए ु बड़ा गु सा आया | मने कहा , “ ऐसा य कया ? जब आपने मझे ु ु ह | मझे पैसे नह ं दे ना ह नह ं था तो चेक दे ने का नाटक य कया ? जब आपके अकाउं ट म पैसे नह ं थे तो चेक न दे ते ? कैश का इंतज़ाम कर दे ते | आज म सामने वाले को भरोसा दलाकर बक म लाया था | उ ह ने कहा , “ जहाँ दो मह ने तक | अब म

के, दो घंटे और

क जाओ | म अवाक

या क ँ ? ये आदमी तो झठ ू पर झठ ू बोले जा रहा है और टालने म

मा हर है | सोचा दो घंटे बाद बक म सीधे चलते ह | अगर पैसे अकाउं ट म आ गए तो लाटर लग जाएगी, नह ं तो आज तो पैसे मलने से रहे | बक म पता कया तो पता चला क अकाउं ट म पैसे ह नह ं ह | कछ भी नह ं है | ु

अब मने इनको ऑ फस म घेरने का सोचा और जब कमरे म दे खा तो ये शांत

बैठे थे या न मेरे लए कोई

य न नह ं कर रहे थे | उ ह ने मझे पर मने ु बलाया ु

कहा म जरा आता हँू और सीधे अपने ऑ फस के हे ड साहब के पास पहँु चा | उ ह

जब मने अपना क सा सनाया तो उ ह ने कहा, “ पैसे दे ने से पहले मझसे पछ लए ु ु ू होते | ऐसे कसी को भी पैसे नह ं दे ना चा हए | ठ क है , शंग ृ ाल सं ह पैसे दे दे गा, नह ं तो हम दलवा दगे | आप टशन मत लो |” मने

तभी मेरा मोबाइल घनघनाया और मने दे खा क शंृगाल सं ह फोन पर ह तो

पीकर मोड पर फोन रख दया तो शंृगाल सं ह कह रहा था क घर पर चलो

आपके पैस का इंतज़ाम हो गया है | दोपहर क

श ट बस से चलते ह | मझे ु लगा

क एकाएक ऐसा प रवतन कैसे हो गया | मझे ु लगता है क शायद उसने भाँप लया

था क म बॉस के कमरे म हँू और बॉस से शकायत कर रहा हँू | बॉस ने कहा, “अभी चले जाओ और अपना पैसा ले लो |” दोपहर को श ट बस से इनके घर गया तो नया

ामा तैयार था | घर पर

पैसे तो थे नह ं | बस ऑ फस से नकलने का बहाना चा हए था ता क साहब कसी पछताछ के लए न बला ू ु ल | मझे ु शाम को वापस आने के लए कहा | बताइए

या

कहा जाए | कतना झठ ू बोलता है | चलो घर चलते ह | घर पर पैसे ह | फर घर पर कछ नह ं नकलता | म भी मन मारकर घर आ गया | ु शाम को खद ु

शंग ृ ाल सं ह का फोन आया | चहककर बोला, “ ज द घर पर

आ जाओ और अपना पैसा ले जाओ |”

म भी ज द ह पहँु चा | साहब ने पैसे दये | मने गने | परेू 40,000 थे | बोला, “ thank you.” और उनके घर से बाहर नकला | वे भी शाम क चहलक़दमी के लए साथ नकले | मने पछा ू , “ दोपहर तक तो पैसे नह ं थे | शाम को कैसे आए ?”

उ ह ने कहा, “ मेरा एक म काम करते थे | अब उसका होटल म जाता हँू

है | ऑ फस का कल ग | असम म साथ-साथ

ा सफर मंुबई म हो गया है | वो यह ं वकट

ेसीडसी

का हआ है | उसी से कैश लेकर आया हँू | अ छा चलो, अब म घमने ू ु |”

मने सोचा क मेरा द:ु खद च

द:ु खद च

अब शु

तो 86 दन म परा | पर कसी और का ू हआ ु हो गया है | पता नह ं ये च कतने दन, कतने मह ने या

कतने वष चलेगा और न जाने इस झठ ू के पु लं दे से नकलगी नत नई कतनी

कहा नयाँ....... कतने नाटक....... कतनी न क-झ क..... कतने भी न जाएँ और शायद पढ़े भी न जाएँ |

संग.....जो शायद लखे

क वता मने, कब है ह मत हार । जब भी आई, मसीबत भार ॥ ु पैर म है लगा शनीचर, दौड़ रहा, दन-रात नरं तर, टटा ू , कतनी बार, म थककर फर भी, उठकर क तैयार । मने, कब है ह मत हार ।। जब धन ने मख मोड़ लया, ु तन ने हर साहस तोड़ दया मिु कल म अकेला छोड़ दया तब मन ने ल िज मेदार ॥ मने, कब है ह मत हार ।। मझको ठोकर मारने वाले, ु अपना पाँव ज़रा सहला ले, हम वो नह ं उखड़ने वाले लगा ले अपनी ताकत सार ॥ मने, कब है ह मत हार ।। द ु नया शल आई, ू चभाने ु यंग-बाण तरकश म लाई पर, म दगा ँ ू नह ं दहाई ु खेलँ ूगा, इक ल बी पार ॥ मने, कब है ह मत हार ।। माना मझको अपमान मला है, ु पर, मन म नह ं कोई ग़ला है अब भी चेहरा खला- खला है जीवन का संघष है, जार ॥ मने, कब है ह मत हार ।।

क पलकमार रामबरन सरोज ु सरोज सदन, ए-2/32, खा दा कॉलोनी, नवीन पनवेल (पि चम) िजला : रायगड़ संपक : 9969224952

क वता रात बो झल हो रह है । नींद गहर सो रह है ॥ छा रहा घनघोर तम है, दल के चार ओर ग़म है मज़बरू से, लाचार हम ह वेदना खद ु रो रह है ॥ रात बो झल हो रह है । अ ु को पीना पड़ा है, ह ठ को सीना पड़ा है मौत को जीना पड़ा है, हालात मिु कल बो रह है ॥ रात बो झल हो रह है । जाने हआ ु

या आज है.

नासाज दल का साज़ है और घट ु रह आवाज़ है अ दाज़ अपना खो रह है ॥ रात बो झल हो रह है ॥ द:ु ख का बड़ा सा ा य है, सख ु को मला वै रा य है यह रा

का दभा ु य है

जैसे िज

त ढ़ो रह है ॥

रात बो झल हो रह है । फर भी मन म आस है, मन म लघु

बल व वास है

व न का

काश है

जो का लमा को धो रह है ॥ रात बो झल हो रह है ।

क पलकमार रामबरन सरोज ु सरोज सदन, ए-2/32, खा दा कॉलोनी, नवीन पनवेल (पि चम) िजला : रायगड़ संपक : 9969224952

ऑ फस क वता (हा य) एक दन मेरे ऑ फस म, मचा हंगामा, मची अफ़रातफ़र , मचा हाई वो टे ज

ामा,

चपरासी बोला, “साहब को हआ है बहत ु ु बड़ा टशन य क इस बार नह ं मला

मोशन”

बौखलाये बॉस ने, के बन म बलाया , ु छोट -छोट बात पर जमकर सनाया ु गु से म भरकर, म घर पर जो आया, तो चाय क

याल म जैसे, तूफ़ान खलबलाया ।

जल -कट , मन म, जो कछ ु भी आया, दो गने याज़ के संग, प नी को सनाया । ु ु प नी झ लाई, थोड़ा भनभनाई ु ु , िजद करते ब चे को तमाचा लगाई लड़का च लाया, कछ ु समझ नह ं पाया, रोते-रोते घर के बाहर बड़बड़ाया , म मी..ग द -ग द म मी. वेर -वेर बैड कहते हए ु ब चे ने गु सा उतारा, भ क रहे प ले को लकड़ी से मारा, कु ता बल बलाया, घंटे भर अपना दखड़ा सनाया ु ु मने सोचा, एक यि त का दभाव , कर सकता है, कतना बड़ा घाव ु जाने कतने लोग क िज़ द गय म ला सकता है टकराव ॥ एक ऑ फस के बॉस के द ु यवहार का असर पड़ सकता है कसी मासम ू , गल के प ले पर दसरे दन ऑ फस म, मने, चम कार दे खा, ू बॉस के मखड़े पर, खल हई ु ु थी, मु कान भर रे खा ॥ मने य सोचा, बाल को नोचा, लगता है, बॉस जैसे, फर से बौखलाया है मोशन न मलने क घटना, या यँू कहो दघटना ने, पागल बनाया है ु

आज

या हस ँ -हसकर ँ

कल वाला क सा,

लायेगा ?

या फर से दोहरायेगा ?

मु कराते हए ु ु बॉस ने, के बन म बलाया गमजोशी से मलकर, पेडा खलाया । कहा, “मेरा डबल

मोशन हआ है । ु

आज ह हे ड- वाटर से, कंफमशन हआ है । ु लाओ तु हारे प डं ग ओवर टाइम के बल पास कर दँ ू और अवाड के लए तु हारे नाम क

सफा रश खास कर दूँ |”

ओ.ट ने मोट रकम दलाई, मझे ु अपनी प नी क साड़ी याद आई साड़ी लेकर म घर पर जो आया, तो प नी ने भी शकवा- शकायत भलाया ु खश ु होकर, ब चे को, बि कट का परा ू , पै कट थमाया । ब चा, खशी ु से मु कराया, परा ू पैकट, पाकर इठलाया गीत गाते-गाते, घर से बाहर आया । म मी.. यार - यार म मी. सो-सो ..

वीट कहकर,

कु ते के प पी को यार से बलाया ु गोद म रखकर बि कट खलाया ॥ मने फर सोचा क एक यि त का स ाव, डाल सकता है कतना बदल सकता है, जाने कतने लोग क िज़ द गय का तो दो त ! दभाव से दभाव ज म लेता है | ु ु सदभाव से सदभाव ज म लेता है | इस लए करो सबसे सद यवहार | ता क हो सखमय यह संसार || ु

क पलकमार रामबरन सरोज ु सरोज सदन, ए-2/32, खा दा कॉलोनी, नवीन पनवेल (पि चम) िजला : रायगड़ संपक : 9969224952

वभाव ।

भाव

क वता फर पै स क तंगी है || टकड़ -टकड़ पर पलनेवाल , िज़ंदगी भी ु ु

या भखमंगी है ||

नह ं, बक-बैलस, जो साहस दे ता हो नह ं, दो त- दलदार, जो ढाढ़स दे ता हो नह ं, कोई यापार, जो बोनस दे ता हो नह ं है दे वनहार, जो वापस दे ता हो | पल-पल कतने रं ग बदलती, द ु नया ये बहरंु गी है ||

परणमासी चाँद-सा वेतन आता है ू धीरे -धीरे , घटते-घटते जाता है पं ह दन म जैसे अमावस छाता है बाक़ मह ना ख़न ू के आँसू

लाता है |

कतने मीत श ु बन जाते, सब दौलत के संगी ह ||

बीबी-ब चे करते झगड़ा, कसी को साड़ी, कसी को कपड़ा िज़ंदा रहने का ख़च है तगड़ा कसे सनाऊ ु ँ जाकर दखड़ा ु ब ल के छ ंके के जैसे, क मत कह ं पे टगी है || ँ

जाने वो दन कब आयेगा धन भी हम पर हषायेगा द ु वधा दरू कए जायेगा मन म खशहाल लायेगा ु आज जहाँ है क ट के आँसू ,

व न वह ं सतरं गी ह ||

प चीस हज़ार कभी-कभी कहानी कहा नयाँ तो य -त -सव चा हए । दे खते नह ं

लखने के

वाहा

लये खच भी करना होता है । आप कहगे



होती ह । उसके लये कहाँ खच आता है । सफ लखनेवाला

ंथ के

ंथ, रचनावल पर रचनावल है क केवल पढने म कतना

समय लग जाता है । फर सोचा जा सकता है क लखने म न जाने कतना समय लगा होगा ।यहाँ तो पढते- पढते आदमी सो जाता है ले कन उस लेखक का सो चए जो रात-रात भर जाग उसे परा ू करता है । िजसके दमाग म उस कथा-संसार का परा ू खाका उसे चैन से सोने नह ं दे ता । फर वह सो भी कैसे सकता है जब वह उस संसार का रच यता है । पा

क रचना कभी-कभी उसे उस मोड पर ला खडा करते ह जहाँ से वापस मडना स भव नह ं ु होता । तो म कह रहा था क कहानी लखने के लये भी खच करना पडता है नह ं तो या मझे ु इस कहानी के लये प चीस हज़ार

पये दे ने पडते ?

मेरा जीवन भी क ट और अभाव म गजरा । फर भी न जाने कौन-सी ऐसी शि त ु

काम कर रह थी जो मझे ु सदै व आगे बढने क डगमगाते न थे । साहस और धैय क पर

ेरणा दे त ी रह । वपदाओं म भी पद

ा म अ सर उ तीण होता रहा । क पनी के

गहृ- नमाण योजना के तहत मैने अपना एक दो मंिजला घर बना लया । क पनी के कम याज के कारण घर को िजतना सजा सकता था, उतना सजा लया । ऎसा घर िजसे यहाँ

बंगला कहते ह । यव था ऎसी क िजसम तीन प रवार आराम से अपना गजारा कर सके ु और ऊपर ल बा टे रेस जहाँ ग मय म ठं डी हवाओं का आन द लया जा सके । बजल के

न होने पर इसका इ तेमाल बढ जाता । वह ं ठं डी बयार लेने का सख और दर ु ू से आती े न तथा हाइवे के वाहन को दे खना कसी सर ु य

य से कम न था । सामने ऊँचे पहाड

और बा रश म बहते झरन को दे खना एक अलग ह नशा पैदा करता । हाँ, टे रेस पर छत

न होने के कारण बा रश का पानी ऊपर से नीचे तक सीलन पैदा करता । बा रश के चार मह ने छोड द तो बाक आठ मह ने मझे ु सख ु और शां त

ा त हो रहा थी ।

जनवर क मह ना था । पडोस के कोल साहब अपने घर का काम करवा रहे थे ।

उ ह ने एक काँ े टर को काम दया था । कोल साहब ने बडी तार फ करते हए ु कहा क ये आदमी क यम ू खान है । यह आदमी बडे काम का है । जहाँ अपने यहाँ इस काम का लोग चार लाख माँग रहे ह वहाँ यह

यि त केवल मजदरू लेकर दो लाख पचह तर हज़ार

म काम कर दे गा । अपने को सफ सामान लाकर दे ना होगा । वह

यि त पछले एक

मह ने से काम कर रहा था । मलते ह नम कार करता और काम म लग जाता । कभी कोई सामान, कभी कोई म

ी, कभी कोई मजदरू लाते हए ु दख जाता ।

एक दन उसने पछा ू ,” साहब, आप छत

य नह ं डलवा दे ते ?”

मैने कहा, “ छत तो डलवानी है ले कन अभी पैसे नह ं ह ?” उसने कहा, “ साहब ! आप तो अपने गाँव-दे श के ह । आप से

या सौदा करना ? पहले

सामान का केवल इंतजाम कर दो । मजदरू को म सँभाल लँू गा । आप भाग थोडे ह जायगे ?”

या घर छोड़ कर

हम दोन हँस पडे । पर कसे पता था क यह हँसी मझे कतनी मँहंगी पडेगी । दन-रात ु का सख ु -चैन लट ु जायेगा और मझे ु खद ु पर रोना आयेगा ।

मने कहा, “सच कहता हँू ।अभी मेरे पास पैसे नह ं ह ।अभी वेतन को दो दन और है ।“ उसने कहा,” कोई बात नह ं । अभी मझे ु भी कोल साहब का काम करने म एक स ताह का व त लगेगा ।

ले कन, हाँ अगर आप और कोल साहब दोन छत डलवा लगे तो एक

ह मजदरू म दोन का काम हो जायेगा । बाहर लोग 80 आपसे केवल 65 नह ं होगा ।“

पये पर फ ट करते ह । म

पये लँू गा । दो पै सा आपका बच जायेगा और मेरा सामान भी खराब

स ताह बीतने के बाद उसने फर एक बार कहा,” साहब, कल सीमट के प े और ट ल के खभ के ँ

लये जा रहा हँू । अगर आप भी सामान मँगवा लेते तो एक ह टे पो म सब चला आयेगा । नह ं तो फर कम से कम 700-800 पये टे पो का भाडा चला जायेगा । यहाँ काफ मँहंगा है । िजस सीमट के प े का दाम यहाँ 800 होलसेल क दकान से 600 ू

पये म आ जायेगा ।

यादा नह ं 12,000

पये है , वह

पये दे द िजए तो

सामान आ जायेगा । बाद म जब मज़ अपना काम करवा ल िजए । “ मने सोचा क सच ह तो कह रहा है । यहाँ सब सामान लगभग दगने ु ु दाम म मलता है । अभी वेतन से 12,000

मले

पय से सामान ले लेते ह । बाक दे खा जायेगा । मने उसे

पये का चेक दे दया । शाम को दे खा क सचमच ु

ट ल के ख भे और कछ ु

सीमट के प े आ चक ु े ह । ले कन वे सब कोल के घर के पास रखे गये ह । मने पछा ू ,” ये प े और ख भे वहाँ

य रखे गये । इसे मेरे घर के पास रखना चा हए था

।“

उसने कहा,” साहब! गलती हो गयी । मज़दरू कोल साहब का सीमट का प ा रख रहे थे, तब आप ऑ फस गये थे और आपका घर ब द था । ले कन कोई बात नह ं है । ये

टल

के ख भे आपके घर रखवा दे ता हँू । प े जब ऊपर टे रेस पर चढायगे तब अलग-अलग हो जायगे । अभी 18 प े ह । 9 आपके यहाँ चढगे और 9 कोल साहब के यहाँ ।“

फर उसने कहा,” साहब । अभी और पाँच हज़ार दे द िजये तो कल ह इन ख भ को छत

पर डाल दे ते ह । वेि डंग करना पडेगा । चार मज़दरू लगगे और मज़दरू काम ऐसे नह करगे जब तक क उ ह पैसे न दये जाय ।“

मने फर सोचना शु

कर दया क कैसे इंतज़ाम कया जाय । अभी ब नये का बल दे ना

कहा,” साहब ! फ

छो डये । अभी नह ं हो तो दो दन बाद दे दे ना । साहब ! सब पैसा

है । दधवाले का और फर ू

कल ु म ह था क उसने फर ू बस का । अभी म इसी उधेडबन

ह नह ं होता । इंसा नयत भी कोई चीज़ होती है । पै से के कारण इंसा नयत छोड दे ना,

मझे ु ठ क नह ं लगता । हम लोग भी गर ब घर से आय ह । आप चं ता मत क रये । आपका काम हो जायेगा तो आपके

दल से

नकल

जायेगा ।“

दआ से ह मेरा काम-ध धा बढ ु

म उसक बात से

भा वत हो गया और मने जोश म कहा,” अ लाह ! आपको बहत ु तर क दे । दे खता हँू क या हो सकता है । बार-बार तो यह काम होगा नह ं । आप पर य बोझा बढे ।“

दसरे दन कसी तरह मने 5,000 ू

पये का इंतज़ाम कया और उसे दे दया । उसने पैस

क तह बनाकर जेब म ऐसा रखा जै से वह कोई ह रे का तकडा हो । मझे यह ु ु अज़ीब लगा क इतने काम करनेवाला पैसे चोर पॉ कट म ऐसे रखता है ?

यवहार

दो दन बाद मने सना क कोल साहब और उसका झगडा हो गया है । काम ब द कर ु

दया गया है । मने उसे मोबाइल पर बात करनी चाह तो वह मोबाइल हमेशा ब द बता

रहा था । मने सोचा क पै से गये पानी म । अगले दन मु ला जी कार गर को लाते दखे । उ ह ने अपने साथ वेि डं ग मशीन और क टं ग करने का सामान लाया था । उन सभी को दे ख म खश ु हो गया क चलो अपना काम तो हो जायेगा ।

मु लाजी से शकायत भरे लहज़े म मने कहा,” मु लाजी ! मझे ु तो लगा क मेरे पैसे गये । आपका कोल साहब से झगडा हो गया है और मोबाइल लग नह ं रहा है ।“

मु लाजी ने कहा,” साहब ! आपके पैसे डबाकर मझे ू ु पाप नह ं कमाना है । आप सीधे-सादे

मेहनत कर अपनी गज़ारा करनेवाले लोग ह । आपको धोखा दे कर अ लाह के आगे जाना ु है ।“

मने पछा ू ,” कोल साहब का आप काम नह ं कर रहे हो ।

या उ ह धोखा नह ं दे रहे हो?”

मु लाजी बोले,” साहब ! उनका काम म इतने स ते म कर रहा हँू । बाहर चार लाख म हो रहा था ले कन मने उनका काम केवल दो लाख पचह तर हज़ार म कर रहा हँू । अभी उ ह ने काम बढा दया । पहले तीन

लोर का काम करने क बात हई ु थी । अब वे चौथा लोर भी काम करवाना चाहते ह ले कन उसको उसी पैसे म करने के लये कह रहे ह ।

आप बताओ । म

या कोई सेठ हँू जो उनका काम उसी पैसे म कर दँू । मने कोल साहब को बोला िजतना अपना तय हआ है उतना ह काम क ँ गा । अगर आप को आगे का काम ु

करवाना है तो पैसे लगगे । अब वो पैसे ह नह ं दगे तो काम कैसे क ँ गा ? ले कन आप ने मझे ु पै सा दया है । कार गर को

आप का काम करने के लए ह आया हँू ।“ ट ल के ख भे काटने को दे ने के बाद मु लाजी ने कहा,” साहब ! आप का

जो भी हसाब है वह इस डायर म लख द िजये । म ठहरा अनपढ, गँवार आदमी । पै से के बारे म ज़रा लापरवाह हँू । अगर आप इसम लख दगे तो हसाब- कताब म बखेडा खडा नह ं होगा ।“ मने हसाब लखना शु

कया तो उसने कहा,” साहब । टे रेस पर झला ू

लेते ? ब चे बै ठ कर झलगे । आप और आपक ू

य नह ं डलवा

मसेज़ बैठकर बात कर सकगे । इतना

अ छा बँ गला बना है । फर बरसात म झला झलने का अपना मज़ा है ।“ ू ू

मने कहा,” तम रग पर ह हाथ रख दे ते हो । यह सपना ु भी, मु लाजी । एकदम दखती ु तो कब से मन म था पर पैस क

क लत से कभी परा ू नह ं हो पाया ।“

मु लाजी ने कहा,” एक बार म थोडा ज़ोर लगाकर कर ल िजए । बाद को सभी चीज़ मँहंगी

हो जाती ह । फर सपना, सपना ह रह जाता है । अभी म हँू तो यह काम भी कर दँ ग ू ा । बताइये कैसा झला डलवायगे । तीन जन का बैठनेवाला या दो जन का बै ठ नेवाला । मझे ू ु लगता है क आप तीन जन के बैठनेवाला झला ू ले ल िजए ।“

मने हसाब लगाकर कहा,” मु लाजी, अब तक म आप को 17,000 दे चका । आप भी ु दे ख ल िजए । “

मु लाजी ने हँसकर कहा,” हाँ, अब हसाब बराबर लखा गया है । बस, और 8,000

यादा नह ं ।अब

पये दे द िजए तो एक ब ढया झला भी साथ ले आता हँू । अ छ ू और मखमल का काम कया हआ । आप दे खगे तो दं ग रह जायगे । “ ु

डज़ाइन

मने कहा,” पहले ये काम तो करवा द िजये । बाद म दे खगे ।नह ं तो मझे भी कोल क ु तरह बीच रा ते म छोड़ दगे और म अपने

पय के लये मारा-मारा फ ँ गा । “ मु लाजी

बोले,” साहब । म अपने ईमान का खाता हँू । कसी के साथ दगा करके, कसी का हडपकर, नमकहरामी करके नह ं कमाऊँगा । मँु ह पर बोलकर दो पै से यादा ले लँू गा ले कन हराम का एक पैसा भी नह ं खाऊँगा । आ खर मझे ु भी कयामत के दन अ लाह के दरबार म खडे होना है । कसी को लटकर , कसी को सताकर पैसे कमानेवाल का हाल ू

जानता हँू । हमारे गाँव म हमारे एक पडदादा का हाल दे खा है । मरते समय उनक और उनके प रवार क हालत कैसी हई ू ु थी क कसी ने उनको पानी के लये भी नह ं पछा ।“

मने आ चय से पछा ,” ू

य ?

या हआ ? ु मु लाजी बोले,” वािजदअल शाह के ज़माने क बात है । गाँव के िजनक बात कर रहा हँू, वे वािजदअल शाह के यहाँ बावच थे । जब अं ेज ने वािजदअल शाह के रा य पर

हमला कया तो सभी ने अपना सामान बटोरना शु

कर दया ।िजसको जो कछ मला वह ु

लटकर भागने लगा । उस समय उ ह ने भी िजतना सोना-चाँद , ह रे -ज़वाहरात जो ू

ला

धम लगे । इतने सारे ू मच गयी । सब उनको बोहर साहब ! बोहर साहब ! पकारने ु

पय

दकान , परेू इलाके म भी नह ं थी । मँहंगे से मँहंगे कपडे, ज़र के कपडे और न जाने ु

या-

सकते थे, आटे क बोर म छपाकर अपने गाँव वापस आ गये । गाँव आने के बाद उनक ु से उ ह ने बज़ाजा खोल दया । बज़ाजा का मतलब होता है

कपडे क दकान , ऐसी बडी ु

या ? बहत ु लोग को नौकर पर रखा और नवाब क तरह रहने लगे । ले कन, साहब आप सोचकर ताअ जब ु करगे क बाद म उनक मौत पर कफन चढाने के लये कपडा भी नह ं मला । म उस समय छोटा था, ठ क से याद भी नह ं क उनका चेहरा कैसा था

ले कन हमारे अ बा बताते ह क वे जब मरने लगे तो पानी तक दे ने वाला कोई नह ं था । उनके 8 साल बाद उसक बीबी मर । उसका तो बहत । हम लोग ने ु हाल हआ ु ह बरा ु दे खा क उसके बदन का कोई ऐसा ह सा नह ं था िजसम जँू न पड गई हो । मने पहल बार कसी को इतना तडपकर मरते दे खा । कु ते को

जै से कलनी नकल गयी हो और

परा - खजलाते लाल हो गया हो । उसका वो ह ू बदन खजलाते ु ु

दे खता हँू तो र गटे खडे हो जाते ह । अ लाह! ऐसी मौत कसी को भी न दे । लोग बोलते थे क हराम का पैसा कभी भी सख ु नह ं दे ता ।साहब । हलाल क कमाई म ह बरकत है । हम लोग पाँच व त का

नमाज़ अदा करते ह । िजतना भी मेहनत से कमाते ह, उसी म गज़ारा करते ह । आप ु यक न क िजए! आप का पै सा डबाकर अ लाह को ू

या जवाब दगे । “

उनक बात ने मझे झकझोर कर रख दया । मने सोचा क अ लाह के नाम पर कोई ु कसी को नह ं ठगेगा । मझे ु शम आई क मने उसपर व वास

य नह ं जताया । जैसे

इस बात से उसे ठे स पहँु ची और एक नेक-नीयत इंस ान क तौह न हई ु । शट क जेब म कछ पये कसी को दे ने के लये नकाले थे, उसी म से 8,000 पये नकाल कर दये । ु दे खा तो तब तक कार गर ने ऊपर

ट ल के ख भ को खडा कर दया था ।

मु लाजी ने कहा,” ज़रा इन सबको खाने क छु ी दे रहा हँू । एक ज़गह और छत का काम है । तब तक जाऊँ झला लेकर आता हँू । शाम को पाँच बजे के कर ब आ जाऊँगा ू

और आज ह यह काम फाइनल कर दे ता हँू ।“ शाम को म इंतज़ार कर रहा था क वह अब आयेगा, अब आयेगा ले कन वह नह ं आया । फर सोचा, शायद काम क वजह से दे हो गई होगी या सामान लाना रह गया होगा । शायद कल ज़ र आ जायेगा ले कन नह ं न कोई फोन, न कोई स दे श । दन बीतने लगे और अब तक कोई खबर नह ं आई । मन म पैसा

य दे

दया ।

नकसान कर बैठा । अब ु



कसी क

ोध आया क बना काम करवाये पहले ह

चकनी-चपडी बात म आकर अपना इतना बडा ु

या अ लाह के भरोसे रहकर काम होगा? इसी बीच कोल साहब

ने कछ म ु

ी बलाकर सीमट के प े अपनी छत पर चढवा लये । मने जब कहा,” ये ु

सीमट के प े तो दोन के मलकर ह ।“ तो उ ह ने कहा,” मझे ु भी पहले ऐसा ह उसने

कहा था पर उसका पै सा उस सामानवाले ने मझसे लया है । उसका बल मेरे पास है । ु आपका सामान तो उसने लाया ह नह ं ।“

अब मेरे पैर तले क ज़मीन खसकने लगी । मने उसका पता लया और एक दन समय नकालकर उसके पास पहँु चा । वह घर पर बै ठ ा हआ था । मझे ु दे ख च क गया और बाहर ु चलने का इशारा करने लगा । बाहर एक होटल म उससे बात होने लगी । मने उससे कहा,” अरे ! मु लाजी आप तो हम भल ू गये ।“ उसने कहा,” नह ं साहब ! मझे ु अब भी याद है । थोड़ा

क जाईए । आप का सारा काम

कर दे ता हँू ।“ मने कहा,” अब आप पर भरोसा नह ं रह गया । आप ने अ लाह के नाम पर मझे उ लू ु बनाया है । अ लाह आप को माफ नह ं करे गा । लोग मझपर हँस रहे ह क आप ने मझे ु ु प चीस हज़ार का चन ू ा लगा दया । आप ऐसी बेईमानी करगे, मझे ु मालम ू न था ।‘

मु लाजी बोले,” साहब ! आपके साथ बेईमानी नह ं क है । आप का काम कर दँ ू गा ।“ मने कहा,” करान -ए-पाक क कसम खाकर कहो ।“ ु मु लाजी ने प व

करआन पर हाथ रखते हए पर हाथ ू खान, करआन ु ु ु कहा,” म क यम रखकर कसम खाता हँू क म साहब आपका काम कर दँ ग ू ा ।“

मने कहा,” कतने दन म करोगे ? बा रश का समय तो आ गया । अब जब घर म पानी टपकने लगेगा, तब काम करोगे ?” मु ला क यम ू ने कहा,” साहब ! अब आपसे झठ ू नह ं बोलँू गा । मझे ु 3 दन क मोहलत द िजए । म आपका काम खद ु आकर कर जाऊँगा ।“

मने कहा,” इस बार म आप को फोन नह ं क ँ गा ।“ मु लाजी बोले,” अब शकायत का मौका नह ं दँ ग -पाक क कसम खाई है । ू ा । करआने ु दगा नह ं क ँ गा ।“

मने कहा,”अगर इस बार आपने धोखा कया तो बता दँ ू क मने एक लेखक हँू , इसे कहानी का प दे दँ ग ू ा और लोग आपको धोखेबाज के प म पहचानगे ।“

उस दन के तीसरे दन बाद फोन आया क वह घर से सामान लेकर नकला है पर कछ ु गड़बड़ हो गयी है इस लए वह दसरे दन आयेगा । ऐसा कहकर उसने फोन रख दया । ू

उसके बाद फर वह कभी नह ं आया । सीमट के प ेवाले, काम करनेवाले मझसे उसका ु

फोन न बर पछने लगे । मने उन सबको अपनी कहानी बताई तो उ ह ने कहा क उसने ू वािज़दअल शाह से जड़ी ू उसी कहानी को कहकर सबका व वास जीता है और उसी कहानी

के कारण लोग ने उसका काम स ते म और कभी-कभी तो बना पैसे लए काम कया है । उसने हम सभी के साथ दगा-बाजी क है । उन सभी लोग ने ऐसे लोग से जो अ लाह-ताला और करआने -पाक का सहारा लेकर लोग ु को ठगते ह और झठ कसम खाते है । कयामत के दन या क ू

का नाम लेकर अपना

मतलब नकालते ह से खबरदार करने के लए मझे ु यह कहानी लखने का आ ह कया । यह कहानी उन सभी लोग क फ रयाद है जो कसी न कसी और चाहते ह क आप भी ऐसे खबसरत झाँसे म न आय । ू ू

क पल कमार सरोज ु

प म ऐसे झाँसे म आये ह

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